लघुकथा

बारिश, कश्ती और बचपन

बरसात की पहली शाम थी। कंक्रीट के ऊँचे जंगलों के बीच पानी सड़कों पर बह रहा था। गाड़ियों का शोर, मोबाइल में झुकी आँखें और भागती हुई ज़िंदगी— जैसे शहर को भीतर तक कठोर बना चुके थे। आठ वर्ष का शोभित अपनी बालकनी में खड़ा बारिश देख रहा था। हाथ में मोबाइल था, पर मन कहीं और भटक रहा था। तभी उसकी नज़र नीचे सड़क किनारे बैठे एक बूढ़े आदमी पर पड़ी। वह भीगते हुए बड़े जतन से कागज़ मोड़ रहा था। कुछ ही क्षणों में उसने एक छोटी-सी कागज़ की कश्ती बनाई और बहते पानी में छोड़ दी। कश्ती डगमगाती हुई आगे बढ़ी तो बूढ़े के चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर गई— वैसी मुस्कान, जो इस शहर में अब कम ही दिखाई देती थी। शोभित उत्सुक होकर नीचे चला आया।
“दादाजी, यह क्या कर रहे हैं?” उसने पूछा।
बूढ़े ने बहती कश्ती को देखते हुए कहा— “सोचा, देखूँ… बचपन अभी कितना बचा है।”
शोभित चुप रह गया। कुछ देर बाद बूढ़ा धीमे स्वर में बोला— “हमारे दिनों में बारिश आते ही बच्चे घरों से बाहर निकल पड़ते थे। कागज़ की कश्तियाँ बनती थीं… और सपने पानी के साथ दूर तक बहते जाते थे। अब लोग बारिश से बचते हैं बेटा, जीते नहीं।”
शोभित ने पहली बार उस शहर को गौर से देखा। सामने शीशों से ढकी इमारतें थीं, सीमेंट की दीवारें थीं, पर कहीं मिट्टी की खुशबू नहीं थी। बच्चों की आवाज़ें नहीं थीं। बारिश थी, मगर उसमें भीगता बचपन नहीं था।
“मैं भी बनाऊँ एक कश्ती?” उसने संकोच से पूछा। बूढ़े ने मुस्कुराकर जेब से पुराना अखबार निकाला और उसकी ओर बढ़ा दिया।
कुछ देर बाद पानी में दो कागज़ की कश्तियाँ साथ-साथ बह रही थीं— एक बूढ़े के लौटते बचपन की, दूसरी एक बच्चे के खोए बचपन की। बारिश अब भी लगातार बरस रही थी, मानो कंक्रीट के शहर में संवेदनाओं की सूखी धरती को फिर से भिगो देना चाहती हो।

— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016

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