हास्य व्यंग्य

हास्य-व्यंग्य – सुंदरता की तारीफ

एक सहेली ने अपनी सहेली की सुंदरता की तारीफ की तो वह खुद अपनी सुंदरता की बगीचा ही लगा दिया। मैं तो जब पैदा हुई थी। बेहद खूबसूरत थी। किसी ने प्यारी गुड़िया कहा तो किसी ने क्यूट लड़की कह कर तारीफ की थी। कुछ पड़ोसियों ने तो नजर ही लगा दी। जब मेरी माँ आंखों में अंजन लगाती थी तो बेहद खूबसूरत सी नजर आती थी। 

आखिर जब मैं बड़ी होने लगी तो सुंदरता में और चार चांद लग गये। बालों की खूबसूरती और मेरी आंखों में हिरनी जैसी चपलता, मैं एक उछल कूद करने वाली लड़की हो गयी थी। मैं खूब मशहूर हो गयी थी। मेरी सुंदरता की तारीफ तो मेरी माँ खूब जमकर करती थी। पड़ोस में आसमान की नीली परी के नाम से जानी जाती थी। लड़कों के लिए तो मोहल्ले में हलचल कर देने वाली गुड़िया थी। 

स्कूल के दिनों में एक राजकुमारी सी लगने लगी थी। बालों में दो चोटियाँ बनाकर चलती थी। स्कूल के लड़के पीछे-पीछे चलते थे। मुझे अपने सुंदर मुखमंडल पर गर्व होता था कि मैं एक सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाली लड़की हूँ। स्कूल के दौरान प्रेमपत्र तो हजारों मिले थे। किसी ने पूर्णिमा का चांद कहा तो किसी ने फूलों से सजी एक खूबसूरत चंचल लड़की कहा जो खुले आसमां के नीचे रहकर विचरण करती है। किसी ने एक स्वतंत्र जीवन जीने की शौकीन बाला की संज्ञा दी।

जब मैं युवा हो गयी तो बहारों की मल्लिका हो गयी। कोई सुदूर अंचल से निहार रहा है तो कोई खिड़कियों से देखकर आह का स्वर होंठों पर लाता। सच बता रही हूँ। कई युवकों ने तो मेरे वजह से मल्लयुद्ध भी कर लिये। किसी के दांत टूटे तो किसी का थूथन तो किसी जबड़ा ही फट गया। मैं सबको चकमा दिया। कोई मुझे अपने गले का हार नहीं बना सका। कवियों ने तो ढेर सारी कविताएँ मेरी सुंदरता पर लिख दी। 

जब मैं शादी के पूर्ण योग्य हो गयी। सब चाहने वाले अपनी-अपनी गृहस्थी बसा ली। कोई लड़का मिला नहीं तो यही बुद्दू मियां मिल गये। बड़े-बड़े दो दांत निकले हैं। जवानी में सूखकर कांटा जैसे दिखते हैं। न तो तन में रौनक न तो मन में कोई भाव। अब इन्हीं में अपना जीवन जी रही हूँ। मेरी सुंदरता की जो कद्र होनी चाहिए थी शायद मेरे गुरूर ने मुझे यहाँ लाकर पटक दिया। यही मेरी पटकथा है।

— जयचन्द प्रजापति ‘जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com

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