गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

देख जलती शमा रोशनी मिल गई।
हद से ज़्यादा हमें खुशी मिल गई।।

जब अँधेरा किया राह में ही सनम।
गुनगुनाती हुई रागिनी मिल गई।।

हम तड़पते रहे तुम चले ही गये।
जब चले ही हमें बंदगी मिल गई।।

जब कहा था तुम्हीं ने बढ़ाया क़दम
उफ़ हमें क्यों यहीं निंदनीय मिल गई।।

फ़लसफ़ा साफ़ ही था नहीं सब सुनो।
सोचता क्यों अभी गंदगी मिल गई।।

डर लगा ही रहा राह में छोड़ दे।
हाँ कहा तो हमें तो खुशी मिल गई।।

चेहरे पर झलकता सदा प्यार ही।
तुम मिले यूँ लगा ज़िंदगी मिल गई।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’

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