फुटपाथों की वापसी का समय
भारत के शहरों का विकास पिछले कुछ दशकों में जिस दिशा में हुआ है, उसने एक गंभीर और विडंबनापूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है। शहरों में सड़कें चौड़ी होती गईं, फ्लाईओवर बढ़ते गए, वाहन बढ़ते गए, पार्किंग के लिए नए-नए स्थान खोजे जाते रहे, लेकिन इस पूरी विकास-यात्रा में सबसे अधिक उपेक्षित यदि कोई हुआ तो वह है पैदल चलने वाला सामान्य नागरिक। जिस फुटपाथ का निर्माण मूलतः मनुष्य को सुरक्षित चलने का अधिकार देने के लिए किया गया था, वही फुटपाथ आज अतिक्रमण, अव्यवस्था, व्यापारिक कब्जों, अवैध पार्किंग, निर्माण सामग्री, कूड़े और प्रशासनिक उदासीनता के बीच अपनी पहचान खो चुका है। भारतीय शहरों में आज स्थिति यह है कि सड़कें वाहनों की हो गई हैं और फुटपाथ या तो गायब हैं, या इतने बदहाल हैं कि उन पर चलना स्वयं एक जोखिम बन गया है। यह केवल नगर नियोजन की समस्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों, सामाजिक समानता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सभ्यता के चरित्र से जुड़ा हुआ प्रश्न है। अब समय आ गया है कि भारत “रीक्लेम द फुटपाथ” अर्थात फुटपाथों को पुनः जनता के लिए वापस लेने के राष्ट्रीय अभियान की आवश्यकता को गंभीरता से समझे।
किसी भी सभ्य शहर की पहचान केवल उसकी ऊँची इमारतों, चमकदार सड़कों या विशाल मॉलों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहाँ एक सामान्य नागरिक कितनी गरिमा और सुरक्षा के साथ पैदल चल सकता है। दुर्भाग्य से भारतीय शहरों में पैदल चलने वाले को लगभग द्वितीय श्रेणी का नागरिक मान लिया गया है। नगर नियोजन का पूरा ढाँचा वाहन-केंद्रित होता चला गया है। नई सड़क बनाते समय सबसे पहले यह सोचा जाता है कि कारें कितनी तेजी से दौड़ेंगी, ट्रैफिक कितना कम होगा, पार्किंग कहाँ बनेगी, लेकिन यह शायद ही सोचा जाता है कि एक बुजुर्ग व्यक्ति, एक बच्चा, एक दिव्यांग नागरिक, एक महिला या एक गरीब मजदूर सुरक्षित रूप से पैदल कैसे चलेगा। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत के शहरों में आज भी बहुत बड़ी आबादी प्रतिदिन पैदल चलती है। लाखों लोग बस स्टैंड तक, रेलवे स्टेशन तक, बाजार तक, स्कूल तक और कार्यस्थल तक पैदल पहुँचते हैं। लेकिन उनकी सुविधा और सुरक्षा नगर प्रशासन की प्राथमिकताओं में दिखाई नहीं देती।
फुटपाथ केवल चलने का स्थान नहीं होता, वह शहर की सामाजिक आत्मा का हिस्सा होता है। फुटपाथ लोगों को जोड़ता है, सार्वजनिक जीवन को जीवंत बनाता है, छोटे व्यापारों को जन्म देता है, संवाद पैदा करता है और शहर को मानवीय बनाता है। जिस शहर में लोग पैदल चल सकते हैं, वहाँ सामाजिक जीवन अधिक सक्रिय होता है। इसके विपरीत जहाँ पूरा शहर केवल वाहनों के लिए डिजाइन किया जाता है, वहाँ मनुष्य धीरे-धीरे मशीनों के पीछे छूटने लगता है। भारत के अनेक शहरों में आज यही हो रहा है। सड़क पार करना एक युद्ध जैसा अनुभव बन चुका है। फुटपाथों पर चलना असंभव हो गया है। कहीं दुकानदारों ने कब्जा कर लिया है, कहीं रेहड़ी-पटरी ने रास्ता रोक लिया है, कहीं मोटरसाइकिलें खड़ी हैं, कहीं सीवर खुले पड़े हैं, कहीं बिजली के खंभे बीच रास्ते में खड़े हैं और कहीं फुटपाथ का निर्माण ही इस प्रकार किया गया है कि वह पैदल चलने योग्य नहीं रह जाता। परिणामस्वरूप लोग मजबूरी में सड़क पर चलते हैं और दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं।
भारत में सड़क दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या पैदल चलने वालों की होती है। यह केवल ट्रैफिक अनुशासन का प्रश्न नहीं, बल्कि उस सोच का परिणाम है जिसमें शहरों को कारों के लिए बनाया गया और मनुष्यों को उसके बीच संघर्ष करने के लिए छोड़ दिया गया। विडंबना यह है कि भारत जैसे देश में जहाँ बड़ी आबादी निजी कारों की मालिक नहीं है, वहाँ भी नगर नियोजन का मॉडल पश्चिमी कार-केंद्रित शहरीकरण की नकल पर आधारित होता चला गया। बड़े-बड़े फ्लाईओवर बनते रहे, लेकिन फुटपाथ टूटे रहे। यह विकास का असंतुलित और सामाजिक रूप से अन्यायपूर्ण मॉडल है। एक गरीब व्यक्ति जिसके पास कार नहीं है, जो पैदल चलता है या सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करता है, वह भी समान रूप से शहर का नागरिक है। उसे सुरक्षित चलने का अधिकार उतना ही है जितना किसी कार मालिक को सड़क उपयोग का अधिकार है।
फुटपाथों की दुर्दशा का एक बड़ा कारण प्रशासनिक दृष्टिकोण भी है। नगर निकाय अक्सर फुटपाथ को स्थायी सार्वजनिक संपत्ति के रूप में नहीं, बल्कि ऐसी जगह के रूप में देखते हैं जिसे किसी भी समय तोड़ा, खोदा, घेरा या अतिक्रमित किया जा सकता है। कभी पाइपलाइन के लिए फुटपाथ तोड़ दिया जाता है, कभी केबल डालने के लिए, कभी निर्माण सामग्री रख दी जाती है, कभी राजनीतिक पोस्टर और विज्ञापन उस पर कब्जा कर लेते हैं। कई शहरों में तो फुटपाथ केवल कागजों पर मौजूद हैं। जो बने भी हैं, वे इतने संकरे, ऊँचे-नीचे या अव्यवस्थित हैं कि आम नागरिक सड़क पर चलना अधिक सुविधाजनक समझता है। यह स्थिति विशेष रूप से बुजुर्गों, दिव्यांगों और बच्चों के लिए अत्यंत खतरनाक है।
फुटपाथों को पुनः प्राप्त करने का अर्थ केवल अतिक्रमण हटाना नहीं है। इसका अर्थ शहरों की सोच को बदलना है। शहरों को यह स्वीकार करना होगा कि सड़क केवल वाहनों के लिए नहीं होती। सड़क सार्वजनिक जीवन का साझा स्थान है। आधुनिक शहरी नियोजन में अब पूरी दुनिया “वॉकएबल सिटी” अर्थात पैदल चलने योग्य शहरों की अवधारणा की ओर लौट रही है। यूरोप, जापान और कई अन्य देशों में यह समझ विकसित हुई है कि यदि शहरों को रहने योग्य बनाना है तो पैदल चलने वालों, साइकिल चालकों और सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देनी होगी। चौड़ी सड़कें और अधिक वाहन अंततः ट्रैफिक समस्या का समाधान नहीं करते, बल्कि नई समस्याएँ पैदा करते हैं। इसके विपरीत यदि शहर इस प्रकार डिजाइन हों कि लोग पैदल चल सकें, साइकिल चला सकें और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग सहजता से कर सकें, तो शहर अधिक स्वस्थ, शांत, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल बनते हैं।
भारत में “रीक्लेम द फुटपाथ” अभियान को केवल शहरी सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के अभियान के रूप में भी देखा जाना चाहिए। पैदल चलना मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। आज मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और मानसिक तनाव तेजी से बढ़ रहे हैं। यदि शहर ऐसे हों जहाँ लोग सुरक्षित और आराम से पैदल चल सकें, तो समाज का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। लेकिन वर्तमान स्थिति में लोग पैदल चलने से बचते हैं क्योंकि फुटपाथ असुरक्षित हैं, धूप से रहित हैं, टूटी हुई अवस्था में हैं या पूरी तरह अतिक्रमित हैं। इस प्रकार खराब फुटपाथ केवल शहरी असुविधा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट भी बन जाते हैं।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी फुटपाथ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि शहर पैदल चलने और साइकिल के अनुकूल बनें तो निजी वाहनों का उपयोग घट सकता है। इससे पेट्रोल-डीजल की खपत कम होगी, प्रदूषण घटेगा, कार्बन उत्सर्जन कम होगा और शहरों का तापमान भी नियंत्रित रहेगा। आज भारतीय शहर हीट आइलैंड बनते जा रहे हैं जहाँ कंक्रीट, डामर और वाहनों की गर्मी मिलकर तापमान बढ़ाती है। यदि फुटपाथों के साथ वृक्षारोपण, हरित पट्टियाँ और छायादार मार्ग विकसित किए जाएँ तो शहर अधिक ठंडे और रहने योग्य बन सकते हैं। इस प्रकार फुटपाथ केवल परिवहन का विषय नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है।
यह भी समझना आवश्यक है कि फुटपाथों पर होने वाला अतिक्रमण केवल प्रशासनिक विफलता का परिणाम नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक और सामाजिक संरचना से भी जुड़ा है। लाखों छोटे रेहड़ी-पटरी व्यवसायी जीविका के लिए फुटपाथों पर निर्भर हैं। इसलिए समाधान केवल बलपूर्वक हटाने में नहीं हो सकता। आवश्यकता संतुलित और मानवीय नीति की है जिसमें पैदल यात्रियों का अधिकार भी सुरक्षित रहे और छोटे व्यवसायियों के लिए व्यवस्थित स्थान भी उपलब्ध कराए जाएँ। शहरों को इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान विकसित करना होगा। फुटपाथ पूरी तरह कब्जा-मुक्त भी रहें और आजीविका भी सुरक्षित रहे — यह संतुलन संभव है यदि नियोजन ईमानदारी और संवेदनशीलता से किया जाए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फुटपाथ का प्रश्न लोकतंत्र का प्रश्न भी है। शहर यदि केवल कार मालिकों के लिए बनते हैं तो वे सामाजिक असमानता को बढ़ाते हैं। फुटपाथ गरीब और अमीर दोनों के लिए समान रूप से आवश्यक है। एक बच्चा, एक बुजुर्ग, एक मजदूर, एक छात्र, एक महिला — सभी को सुरक्षित चलने का समान अधिकार है। जिस समाज में पैदल चलने वाला असुरक्षित हो जाए, वहाँ विकास का मॉडल मूलतः असंतुलित माना जाना चाहिए। इसलिए फुटपाथों की वापसी वास्तव में शहरों को मनुष्यों के लिए वापस लेने का आंदोलन है।
अब आवश्यकता केवल चर्चा की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर ठोस शहरी सुधार की है। हर शहर में फुटपाथों का मानकीकरण होना चाहिए। चौड़े, समतल, छायादार, दिव्यांग-अनुकूल और अतिक्रमण-मुक्त फुटपाथ विकसित किए जाने चाहिए। नगर निकायों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। पैदल चलने वालों की सुरक्षा को ट्रैफिक नीति का केंद्रीय भाग बनाया जाना चाहिए। स्कूलों, बाजारों और सार्वजनिक संस्थानों के आसपास विशेष पैदल क्षेत्र विकसित किए जाने चाहिए। शहरों में वृक्षों के साथ हरित फुटपाथ बनाए जाने चाहिए। यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता है।
भारत जिस प्रकार तीव्र शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है, उसमें यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि उसके शहर मनुष्यों के लिए बनेंगे या केवल वाहनों के लिए। यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही तो शहर अधिक गर्म, अधिक प्रदूषित, अधिक तनावपूर्ण और अधिक असमान होते जाएँगे। लेकिन यदि फुटपाथों को पुनः प्राप्त करने का व्यापक अभियान चलाया गया, तो भारतीय शहर अधिक मानवीय, स्वस्थ, सुरक्षित और जीवंत बन सकते हैं। वास्तव में फुटपाथ केवल सीमेंट का बना रास्ता नहीं है; वह नागरिक गरिमा, सामाजिक समानता और सभ्य शहरी जीवन का आधार है। इसलिए अब समय आ गया है कि भारत पूरे गंभीरता से कहे — शहरों को फिर से मनुष्यों के लिए बचाना है, और इसकी शुरुआत फुटपाथों की वापसी से होगी।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
