आवास और अधिकार
‘सत्ता’ बदली, बदले चेहरे, बदले शासन के व्यवहार,
सवाल वही फिर उठा, किसका घर-क्या?अधिकार।
कहतीं राबड़ी दृढ़ स्वर में, “नहीं छोड़ेंगे ये आवास।”,
सरकार कहें नियम निभाओ, कानून की ये आवाज़।
राजनीति के इस आँगन में, शब्द बने हैं तीर-कमान,
कोई बोले जन की संपत्ति, कोई मांगे स्वयं सम्मान।
कुर्सी आती, कुर्सी जाती, वक्त बदलता हर पहचान,
आज लोकतंत्र ये कहता, सबसे ऊपर हो संविधान।
मतभेदों के बीच देश का, रहता सदा सम्मान अटल,
संवादों से हल हों मुद्दे, नहीं बढ़े विवादों का दलदल।
(संदर्भ – राबड़ीदेवी सरकारी आवास खाली न करने पर अडी.)
— संजय एम तराणेकर
