पहाड़ों का संगीत और नदियों का गुनगुनाता संदेश
प्रकृति के इन मूक रक्षकों, आदि-काल से अडिग खड़े विराट महाशिखरों और अपनी अनंत हरी छांव में सदियों से एक गहरा, रहस्यमयी मौन साधे इन वीर वनों के अंतहीन साम्राज्य के बीच पसरी यह जादुई और सम्मोहक शांति वास्तव में कोई निर्वात या रीता शून्य नहीं है, बल्कि यह तो संपूर्ण ब्रह्मांड का वह अनाहत नाद और आदि-संगीत है जो केवल और केवल आत्मा की गहनतम गहराइयों में ही तब सुनाई देता है, जब हम आधुनिकता की अंधी चकाचौंध, शहरों की इस मशीनी, प्राणहीन और थका देने वाली अंधी दौड़, कृत्रिमता के आडंबरों और इंसानी बस्तियों के कभी न थमने वाले अंतहीन शोर-शराबे से पूरी तरह टूटकर और थककर इन पर्वतीय अंचलों के इतने आत्मीय करीब आते हैं कि देवदार और चीड़ के पेड़ों की मख़मली, ओस-भीगी हरी पत्तियों को सहलाते हुए उनके नितांत एकांत, उनकी सदियों पुरानी अनकही दास्तां, उनके भीतर छुपे आदिम दर्द और उनकी नीरव भाषा को साक्षात् महसूस कर सकें, क्योंकि ठीक उसी पावन क्षण में हमारे भीतर भौतिकता की नींद में सोया हुआ मनुष्य और परम संवेदना का भावुक कवि एक साथ जाग उठता है। यह वह परम पवित्र और अलौकिक धरा है जहाँ नीले गगन के असीम विस्तार को छूते ये अभेद्य, ऊंचे बर्फ़ीले शिख़र अपनी अचलता से हमें यह महान जीवन-दर्शन सिखाते हैं कि वक्त के क्रूर से क्रूर कड़े थपेड़ों, झंझावातों और मौसम के हर बदलते मिज़ाज को बिना विचलित हुए अगाध धीरज के साथ सहकर भी अपने आत्मसम्मान, अपने स्वाभिमान और अपनी मूल सांस्कृतिक जड़ों पर किस प्रकार मज़बूती से अडिग रहा जाता है, और वहीं दूसरी ओर, इन विशालकाय पहाड़ों का सीना चीरकर, पत्थरों की छाती को बेधकर जब कलकल-छलछल करते चश्मे, ऊंचाइयों से गिरते दुग्ध-धवल झरने और वेगवती नदियाँ अपनी संपूर्ण अलौकिक ऊर्जा के साथ बाहर फूटती हैं, तो वे केवल पानी का कोई भौतिक बहाव मात्र नहीं होतीं, बल्कि वे साक्षात् वसुंधरा के धड़कते हुए हृदय की जीवंत धड़कन बन जाती हैं; जो अपने उद्गम से लेकर मैदानों की ओर बढ़ने की इस दुर्गम और अत्यंत कठिन यात्रा में जब मार्ग में आड़े आने वाली विशालकाय चट्टानों, तीखे मोड़ों और कठोर पत्थरों से बार-बार टकराती हैं, तो यह भीषण टकराव किसी प्रलयकारी विनाश या कोलाहल को नहीं, बल्कि एक अतीव मधुर, कर्णप्रिय और रूहानी ‘कलकल-छलछल’ के आदि-संगीत को जन्म देता है, और ऐसा प्रतीत होता है मानो ये नदियाँ उन निष्ठुर पत्थरों से टकरा-टकराकर, उन्हें सहलाकर और तराशकर पूरे संसार को गुनगुनाती हुई यह अमर और शाश्वत संदेश दे रही हैं कि जीवन का वास्तविक नाम कहीं भी ठहरना या जड़ हो जाना नहीं है, बल्कि मार्ग की हर बड़ी से बड़ी बाधा, विपत्ति और अवरोध को ही अपनी शक्ति बनाकर, उसे काटकर अपना नया रास्ता बनाते हुए निरंतर, अबाध गति से आगे बढ़ते रहना है, क्योंकि मुश्किलें और संघर्ष इंसान को मिटाने या बिखेरने के लिए नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे वास्तविक आत्म-सौंदर्य को निखारने और उसे कुंदन बनाने के लिए ही आती हैं। वनों की इस अत्यंत गहरी, शीतल और रहस्यमयी छाँव के साए में एक अद्भुत, अलौकिक और बिना किसी शर्त वाला निश्छल प्रेम तथा परस्पर सह-अस्तित्व का दिव्य साम्राज्य चारों ओर बिखरा पड़ा है, जहाँ छोटे-बड़े, कड़वे-मीठे, कटीले और छायादार हर प्रकार के पौधे और वनस्पति बिना किसी आंतरिक द्वेष, ईर्ष्या, शिकवे या किसी भी सामाजिक भेदभाव के एक साथ मिलकर पनपते हैं, फलते-फूलते हैं, और संपूर्ण जीव-जगत के कल्याण के लिए, हवाओं को शुद्ध और प्राणदायिनी बनाने के लिए वातावरण के सारे प्रदूषण और विष को खुद पी जाते हैं, तथा अपनी शरण में आने वाले हर एक थके-हारे मुसाफ़िर को, बिना उसका धर्म, जाति या रुतबा पूछे, अपनी अत्यंत शीतल छाँव का ममतामयी आंचल ओढ़ाकर उसे नवजीवन प्रदान कर देते हैं; यहाँ समय का चक्र भी अपनी अनुपम छटा बिखेरता है जब भोर की पहली ऊषाकालीन सिंदूरी किरण इन अभेद्य शिखरों की धवल पेशानी को चूमती है तो वह मानव मन के संशय और अवसाद के गहरे अंधकार को मिटाकर एक नई चेतना, नई ऊर्जा और नई उम्मीद का अखंड दीया रोशन कर देती है, और वहीं दूसरी ओर, गोधूलि बेला में शाम का ढलता हुआ सुनहरा, रक्तिम सूरज जीवन के इस शाश्वत ठहराव, अवसान और मृत्यु को भी एक बेहद ख़ूबसूरत, गरिमामयी और मुकम्मल विदाई का रूप दे जाता है। सचमुच, जब आषाढ़ और सावन की पहली शीतल बूंदें इन वनों की प्यासी, सूखी पत्तियों पर टप-टप गिरती हैं और उस तप्त, पवित्र सोंधी मिट्टी की वह रूहानी, सोंधी महक समस्त फिज़ाओं और वादियों में धीरे-धीरे घुलने लगती है, तब इस धरती के सर्वश्रेष्ठ जीव अर्थात इंसान को अपनी नश्वरता का और इस परम सत्य का गहरा अहसास होता है कि उसका भौतिक वज़ूद और पंचतत्व की यह देह इसी मिट्टी से उपजी है और अंततः एक दिन उसे इसी मिट्टी की गोद में हमेशा के लिए लौट जाना है; हालांकि आज के इस घोर कलियुग में इंसानी स्वार्थ, अनियंत्रित लालच, औद्योगिकीकरण और कंक्रीट के अंधे जंगलों को खड़ा करने की अंधी चाह में इन मूक पहाड़ों का सीना डायनामाइट और मशीनों से बेदर्दी से चीरा जा रहा है, जिससे सदियों पुराने ये प्राकृतिक जल-स्रोत, चश्मे और नदियाँ अब सूखकर सिसकने लगी हैं, फिर भी प्रकृति का यह विशाल आंचल न सिर्फ़ हमें हमारी भूलों के प्रति मूक चेतावनी देता है, बल्कि इसके पावन आंचल के भीतर आज भी औषधीय जड़ी-बूटियों का वह अनंत, अलौकिक खज़ाना और जीवनदायिनी शुद्ध प्राणवायु प्रचुर मात्रा में छुपी हुई है जो हमारे तन और व्याकुल मन दोनों के गहरे से गहरे मानसिक और शारीरिक घावों को पल भर में भर देती है। अंततःजब हम आधुनिक मनुष्य अपने सारे झूठे सामाजिक पद, प्रतिष्ठा, खोखले अहंकार, संकीर्ण मसरूफ़ियतों और चिंताओं को पूरी तरह भूलकर, प्रकृति के इस परम पावन, निश्छल और विराट स्वरूप के सामने नतमस्तक होकर ख़ुद को पूरी तरह समर्पित कर देते हैं, तब इन शांत वादियों, बहते चश्मों और गाते झरनों के बीच बिताया गया हमारा हर एक लघु पल सीधे हमारी आत्मा के सोए हुए तारों को झंकृत कर देता है, हमारे भीतर के कलुष को धोकर आत्मा को असीम तृप्ति प्रदान करता है और हमारी रग-रग में, हमारी धड़कनों में उसी परमानंद, परम शांति और सच्चे रूहानी स्वर्ग का साक्षात् अहसास जगा देता है जिसे हम अज्ञानी मनुष्य अपनी पूरी ज़िंदगी इस बाहरी, कृत्रिम, खोख़ली और स्वार्थी दुनिया की भौतिक चकाचौंध में व्यर्थ ही तलाशते रह जाते हैं, जबकि वह परम सत्य तो यहीं पहाड़ों के संगीत और नदियों के इस गुनगुनाते अमर संदेश में समाहित है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’
