कविता

मैं आंसू में मुस्कान ढूंढ लेती हूं

मैं नारी हूं कोमल और अडिग
मैं ममता की छांव, संघर्ष की आग, चूल्हे की लौ हूं
रण की हुंकार, दुर्गा का अवतार
और सीता का धैर्य भी हूं मैं
समय आने पर जब तब
पर्वत सी खड़ी रहती हूं।
आंचल में सपनों का आकाश
और आंखों में हौसलों की चिंगारी लिए
चुप रहकर इतिहास रच देती हूं।
ठान लेती हूं तो दुनिया बदल देती हूं
मैं अपनों की सुख के लिए दुख दर्द छुपा कर
आंसू में मुस्कान ढूंढ लेती हूं ।
टूट कर भी खुद को जोड़े रखती हूं
और हर रिश्ते में खुद को ढाल लेती हूं
परिवार की धुरी हूं मैं
नया जीवन देकर युग रच देती हूं मैं
नारी हूं मैं।–

— बबीता गंगवाल

बबीता गंगवाल

गृहिणी एवं समाज की धार्मिक सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि एवं सहयोग

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