प्रकृति – कृति – नियति
नए घर में शिफ्ट हुए कुछ ही दिन हुए थे कि एक कबूतर का जोड़ा हमारे घर के मंदिर की ऊपरी मार्बल की ताक में अपना बसेरा बना चुका था। वहां रखी गर्म चादर पर उन्होंने बड़े जतन से अपने अंडे सुरक्षित रखे थे। हमारे कमरे का रोशनदान और मंदिर की खिड़की एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, जिससे हम दोनों—मैं और मेरी संगिनी—उनकी हर गतिविधि को नजदीक से देख पाते थे।
कबूतरी बड़े स्नेह से अंडों को सेती। दिन में कई बार वह रोशनदान से रास्ता बनाकर आती, अंडों को संभालती और फिर उड़ जाती।
एक दिन संगिनी ने मुस्कुराते हुए कहा— “लगता है यह कबूतरी सिंगल मदर है… कबूतर तो बच्चों को छोड़कर कहीं चला गया।”
कुछ दिनों बाद, एक सुबह अचानक “चूं-चूं” की मधुर आवाजें सुनाई दीं। अंडों से दो नन्हें बच्चे बाहर आ चुके थे। नए घर में आए इन नए मेहमानों ने हमारे मन को भी खुशी से भर दिया।
सुबह-शाम जब भी घर में आरती होती, वे दोनों बच्चे अपनी चहचहाहट से जैसे उसमें शामिल हो जाते। घंटी की आवाज के साथ उनकी आवाजें एक अलग ही संगीत रच देतीं।
दिन बीतते गए। दोनों बच्चे—जिन्हें हमने प्यार से “गुटकू” और “मुटकू” नाम दे दिया था—धीरे-धीरे बड़े होने लगे। उनके पंख निकलने लगे और वे ताक पर खड़े होकर इधर-उधर देखने लगे।
कबूतरी अब उन्हें उड़ने की ट्रेनिंग देने लगी। पहले छोटे-छोटे फासले तय करवाती, फिर धीरे-धीरे उन्हें ऊंचाई तक ले जाती।
कुछ ही दिनों में वे ताक से रोशनदान तक पहुंचने लगे और फिर कमरे में भी उड़ान भरने लगे।
अब वे घर के छोटे बच्चों की तरह हमारे परिवार का हिस्सा बन गए थे। घर के सभी सदस्य उन्हें स्नेह से देखते। यहां तक कि हमारी पालतू कुतिया ‘स्पायरा’ भी उन्हें उत्सुकता से निहारती रहती।
लेकिन प्रकृति का संतुलन अपने नियमों से चलता है।
एक दिन संगिनी ने चिंता जताई—
“रोशनदान की जाली के कारण ये बाहर ठीक से उड़ नहीं पा रहे… और कमरे में पंखों का भी खतरा है।”
कबूतरी पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन नियति कुछ और ही लिख चुकी थी।
एक सुबह, उड़ान का अभ्यास करते हुए गुटकू अचानक संतुलन खो बैठा और रोशनदान से नीचे कमरे के कोने में गिर पड़ा।
उसी समय स्पायरा वहां थी…
क्षण भर में उसने उसे अपने दांतों में दबोच लिया।
हम दौड़कर पहुंचे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। गुटकू निढाल पड़ा था—प्राण जा चुके थे।
ऊपर जाली के उस पार बैठी कबूतरी नीचे झांक रही थी… और मुटकू चुपचाप सब देख रहा था।
घर में सन्नाटा छा गया।
उस सुबह हर किसी का मन भारी था। लाला नसीबचंद ने उस नन्हे पक्षी को बाहर मैदान में दफनाया। हम सब प्रकृति, कृति और नियति के इस कठोर सत्य को महसूस कर रहे थे।
लेकिन नियति का खेल यहीं खत्म नहीं हुआ।
कुछ ही देर बाद छत पर एक गिरगिट दिखाई दिया, जो धूप सेंक रहा था। तभी अचानक एक बाज झपटा और उसे अपने पंजों में दबाकर उड़ गया।
एक और दृश्य… एक और सत्य।
उस दिन हमने प्रकृति के नियमों को ओर गहराई से समझा।
इसके बाद रोशनदान की जाली को हटाकर बाहर जाने का रास्ता खुला कर दिया गया।
कुछ दिनों की सुस्ती के बाद, आखिरकार कबूतरी अपने दूसरे बच्चे—मुटकू—को सुरक्षित उड़ाकर ऊपर छत पर ले गई।
अब मां और बेटा दोनों खुले आसमान में हैं…
और हमारे घर की छत, उस छोटे से जीवन अध्याय की मूक साक्षी बन गई।
— सुमन राजीव
