हास्य व्यंग्य

राजनीति के लीप ईयर प्रत्याशी

जब से हमारे यहाँ नगर परिषद का चुनाव आया है। चारों तरफ भेंड़िया धँसान मचा हुआ है। जो कभी शेषनाग की तरह धरती के भीतर सोए पड़े थे । वो जाग पड़े हैं। अब वो छोटे-से- छोटे और बड़े -से -बड़े कार्यक्रम में दिखाई दे जाते हैं। जब ऐसे लोग चुनाव नहीं लड़ रहे थे तो पता नहीं उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवण में कोई अच्छा काम किया था या नहींं। लेकिन वे अपने चेहरे पर मुस्कुराहट ओढ़े हुए हैंं। मुस्कुराहट ओढ़कर ऐसे लोग धीर -वीर -गँभीर बने हुए हैं। उनकी नेकनीयती छलक -छलक पडती है। वे दयालु, कृपा-निधान बने हुए हैं। इधर वे अब प्राय: हर छोटे -बड़े कायर्क्रम में दिखाई दे रहे हैं। ऐसे लोग ” लीप- ईयर ” की तरह ही होते हैं। जो राजनीति के छोटे- बड़े हर तरह के आयोजनों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना चाहते हैं। शहर में हर -दूसरा आदमी चुनाव लड़ रहा है। अब इससे बड़ी बात और भला क्या होगी कि मतदाता से ज्यादा प्रत्याशी हो गए हैं। हर तरफ बस चुनाव और चुनाव के ही चर्चे हैं। कुत्ता, बिल्ली, सियार , गैंड़े सब के सब चुनाव लड़ रहें हैं। वो चाहते हैं कि जितना समय तक चुनाव है। बिना वजह भी किसी जलसे में वो पहुँच जाए।

शिव ने सती को मना किया था। भले ही तुम्हारे पिता यज्ञ कर रहें हों। जब तक निमंत्रण ना मिले। तब तक तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए। लेकिन सती गईं। और परीणाम सबको पता है। तो इस प्रकरण से ये बात पता चलती है, कि जब तक कहीं बुलाया ना जाए। तब तक वहांँ जाना नहीं चाहिए। लेकिन चुनावी लोगों पर ये बात लागू नहीं होती है। वे मुँह उठाकर जहाँ -तहाँ घुस जा जाते हैं। यानी प्रत्याशियों को इस बात से कोई मतलब नहीं है, कि कहाँ जाना चाहिए। और कहाँ नहीं जाना चाहिए। तो मैं कह रहा था कि ऐसे लोग जो चुनावों में दिखाई देने लगे हैं ये “लीप ईयर “प्रत्याशी हैं।
एक बार एक ऐसे ही “लीप ईयर ” प्रत्याशी बिना बुलाए ही एक कार्यक्रम में पहुँच गए। लेकिन कुर्सी खाली नहीं थी। लिहाजा आयोजकों को उन्होनें वक्र दृष्टि से देखा। खूब हँगामा हुआ। अव्वल तो उनसे हँगामा का कारण पूछा गया। वे बोले अभी नगर-परिषद का चुनाव होने वाला है। और मैं ” लीप ईयर ” प्रत्याशी हूँ। आने वाले समय में मैं आपका नेता बनूँगा। इस नगर का अध्यक्ष भी बन सकता हू़ँ। आप लोगों को कम-से-कम मुझे तो आमंत्रित करना ही चाहिए था। मैं और कुछ ना कहता। कम-से -कम शहर की साफ -सफाई , प्रदूषण , पानी की खराब व्यवस्था पर ही दो शब्द कह लेता। व्यवस्था करने वाले खीज गए। वो बिना निमंत्रण के आए थे।
आयोजक बोले हम आपको कैसे बुला लेते । यहाँ तो गूँगें – बहरों की कार्यशाला और प्रोग्राम होना था। इसका चुनाव से भला क्या संबंध। “लीप ईयर ” प्रत्याशी बोले। हम भी तो गूँगे बहरे है। आपके भाई- बँदे। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद हम बोलना -सुनना बँद कर देते हैं।
जितना बोलना होता है। बस चुनाव में बोलते हैं। और जनता हमें सुनती है। हम “लीप ईयर” प्रत्याशी हैं। हम चुनाव के बाद बहरे हो जाते हैं। हमारी जुबान चुनाव के बाद बँद हो जाती है। हम तभी बोलते हैं। जब या तो हम सँकट में होते हैं या बोलने के हमें पैसे मिलते हैं या सरकार गिरानी होती है। वरना हम चुपचाप ही रहते हैं। अगर आप अपनी कार्यशाला में बुलाते तो हम विकारों पर बोलते। हम बहरे होने के कारकों पर बात करते। बहरा होने का कारण प्रदूषण ही तो है। ध्वनि प्रदूषण के कारण ही तो लोग बहरे हो रहे हैं। ये राजनीति ही तो है। जिसका हर सिरा आप लोगों से जुड़ा हुआ है।
ये ” लीप ईयर “प्रत्याशी आजकल गलियों -मुहल्लों में नालियों का शिलान्यास,पखानों के उदघाट्न करते हुए लोगों को दिख जाते हैं।

— महेश कुमार केशरी

महेश कुमार केशरी

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