कविता

जिन्हें फेंक दिया गया

लड़कियों के जन्म के बाद
माएँ रोयीं
पिता का मन उदास हो गया
उदास हो गए
रिश्तेदारों के चेहरे
सब मन -ही मन दुखी थे
केवल टिटहरी का रोना बाकी था
उस दिन

चूल्हा नहीं जला कई- कई दिनों तक

ना ही कोई गीत गाए गए
जैसा लड़कों की पैदाईश पर होता है
छठियारी की चर्चा किसी ने ना की
सबके मन उदास थे
हताशा में लोग गश खाए जा रहे थे
बस उनका जमीन पर गिरना शेष रह गया था
सोच रहे थे क्या सोचा था
और क्या मिली
घृणा से मुँह टेढ़ा हो गया लोगों का
अगर पता होता लड़की है तो गर्भ में ही !

सबसे आसान तरीका खोजा जाने लगा
उनको निपटाने का

फेंक दिया गया
धूरे पर
कचरा समझकर

लेकिन लड़कियाँ उग आईं
फूल बनकर माटी से
महकने लगा बगीचा !

कई- कई बार तो जिंदा ही गाड़ दी गईं !
लड़कियाँ खेतों में
ऋतुएँ बदलीं लड़कियांँ
धान बनकर उग आईं खेतों में

जिन लड़कियों को कहीं जगह नहीं मिली
और सोचा लोगों ने आखिर कहाँ
फेंका जाए इनको
तब लोगों ने आसमान की तरफ देखा

और फेंक दिया लड़कियों को
आसमान में
वहाँ ये लड़कियांँ इँद्रधनुष बनकर निकलीं

लड़कियाँ लौट आईं
बार- बार बारिश बनकर

बार-बार लौंटीं
ओस बनकर

तब बालियों ने हँसा
फसल और खेत मुस्कुराए
लड़कियांँ लौंटीं इसी बहाने
जितनी बार हमने फेंका दिया धूरे पर
गाड़ दिया खेतों में
या उछाल दिया हवा में

जितना बार हमने फेंका
उपेक्षा से
लड़कियाँ बार बार उग आईं
पृथ्वी पर जीवण बनकर !

— महेश कुमार केशरी

महेश कुमार केशरी

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