संस्मरण : अधूरी कॉपी का सच
शिक्षकीय जीवन में प्रतिदिन न जाने कितने चेहरे सामने आते हैं। कुछ चेहरे समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं, लेकिन कुछ मासूम आँखें ऐसी होती हैं, जो वर्षों बाद भी स्मृतियों में वैसी ही जीवित रहती हैं। मेरे जीवन का यह संस्मरण भी एक ऐसे ही बच्चे से जुड़ा है, जिसने मुझे किताबों से कहीं बड़ा जीवन का पाठ सिखाया।
यह मेरे शिक्षकीय जीवन के शुरुआती दिनों की बात है। नई-नई नौकरी थी, मन में उत्साह भी बहुत था और स्वयं को एक आदर्श शिक्षका देखने की चाह भी। मैं पूरी लगन से बच्चों को पढ़ाती, उनकी कॉपियाँ जाँचती और हर बच्चे से अच्छे परिणाम की उम्मीद रखती थी। मुझे लगता था कि मेहनत और अनुशासन से हर बच्चा आगे बढ़ सकता है।
मेरी कक्षा में एक बालक पढ़ता था वह बहुत शांत, बेहद संकोची और हमेशा अपनी ही दुनिया में खोया रहने वाला। वह कक्षा के सबसे पीछे बैठता और शायद ही कभी किसी प्रश्न का उत्तर देता। उसकी कॉपियाँ भी अक्सर अधूरी रहतीं। कई बार मैंने उसे समझाया, डाँटा भी, पर उसके व्यवहार में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया।
धीरे-धीरे परीक्षा का समय आ गया। मैंने सभी बच्चों को खूब मेहनत से तैयार कराया। मन में विश्वास था कि इस बार पूरी कक्षा अच्छे अंक लाएगी।
परिणाम वाले दिन जब मैं बच्चों की उत्तर पुस्तिकाएँ देख रही थी, तभी उसकी कॉपी मेरे हाथ में आई। लगभग सारे उत्तर अधूरे थे। कई प्रश्नों के सामने केवल दो-तीन पंक्तियाँ लिखी थीं और कुछ पन्ने बिल्कुल खाली थे। उस अधूरी कॉपी को देखकर मेरे भीतर जैसे गहरा दुःख उतर आया। मुझे लगा कि मेरी सारी मेहनत व्यर्थ हो गई।
उस दिन पहली बार मैंने स्वयं को एक शिक्षक के रूप में असफल महसूस किया। पूरी कक्षा में बच्चों की चहल-पहल थी, लेकिन मेरा ध्यान बार-बार उसी बच्चे की झुकी हुई आँखों पर जाकर ठहर रहा था।
छुट्टी के बाद वह धीरे-धीरे मेरे पास आया। उसके हाथ काँप रहे थे। धीमी आवाज़ में उसने कहा….
“मैम… मैंने पढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन रात को बिजली नहीं थी… और माँ की तबीयत भी बहुत खराब थी।”
उसकी बात सुनकर मैं कुछ क्षण बिल्कुल मौन रह गई। पहली बार मैंने उसकी आँखों के पीछे छिपी थकान और बेबसी को महसूस किया। उस छोटे-से बच्चे की अधूरी कॉपी अचानक मुझे उसके अधूरे बचपन जैसी लगने लगी।
अगले दिन मैंने उसे अपने पास बैठाया। उससे बातें कीं, उसके घर और परिस्थितियों के बारे में जाना। तब पता चला कि उसके पिता मजदूरी करते थे और माँ अक्सर बीमार रहती थीं। घर की जिम्मेदारियों के बीच वह बच्चा जितना पढ़ पाता था, वही उसके लिए बहुत था।
उस दिन के बाद मेरे पढ़ाने का तरीका बदल गया। अब मैं केवल पाठ पूरा कराने वाली शिक्षिका नहीं रहना चाहती थी, बल्कि बच्चों के मन को समझने वाली गुरु बनना चाहती थी। मैंने महसूस किया कि हर अधूरी कॉपी के पीछे आलस्य नहीं होता, कभी-कभी वहाँ संघर्ष, मजबूरी और अनकहे आँसू भी छिपे होते हैं।
धीरे-धीरे उस बच्चे में परिवर्तन आने लगा। वह थोड़ा खुलकर मुस्कुराने लगा, छोटे-छोटे उत्तर लिखने लगा और सबसे बड़ी बात अब उसकी कॉपी पहले से कम अधूरी रहने लगी।
आज भी जब कभी कोई अधूरी कॉपी मेरे सामने आती है, तो मुझे वही बच्चा याद आ जाता है। वह संस्मरण मुझे हर बार यह सिखा जाता है कि शिक्षा केवल शब्दों और अंकों का संसार नहीं है, बल्कि संवेदनाओं से भरी एक ऐसी यात्रा है, जहाँ किसी बच्चे को समझ लेना ही सबसे बड़ी सफलता होती है।
— डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’
