कोयल की पुकार
कोयल जब भी बोलती, मचता बड़ा बवाल।
झूठे शोरों को लगे, जैसे कुछ जंजाल।।
सच की मीठी बात से, क्यों इतना संताप।
झूठे मन को लग रहा, जैसे कोई श्राप।।
कटु वाणी के सामने, मधुर लगे भूचाल—
झूठे शोरों को लगे, जैसे कुछ जंजाल।।
कांव-कांव के शोर में, दबते रहे विचार।
भीड़ जुटाकर कर रहे, सच पर ही प्रहार।।
स्वार्थों के दरबार में, बिकता हर सवाल—
झूठे शोरों को लगे, जैसे कुछ जंजाल।।
कोयल तो बस गा रही, प्रेम और विश्वास।
लेकिन कुछ को चुभ रहा,उसका ये अहसास।।
अंधेरों को खल रहे, उजियारे अब लाल —
झूठे शोरों को लगे,जैसे कुछ जंजाल।।
सत्य कभी झुकता नहीं, चाहे जितना शोर।
सूरज को कब रोकते, बादल ये कमजोर।।
एक दिवस कट कर रहे , झूठों की सब डाल—
झूठे शोरों को लगे, जैसे कुछ जंजाल।।
‘सौरभ’ सच की राह पर, चलना यूँ ही मीत।
कोयल की पहचान है, गाना खुलकर गीत।।
मधुर स्वर की जीत का, लिखता यही मिसाल—
झूठे शोरों को लगे,जैसे कुछ जंजाल।।
✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ
