डकार कई करोड़ गया
जगा के रात फिर आंखों में ख्वाब छोड़ गया
मेरा जो खास था हौले से दिल को तोड़ गया
मुझे किसी से रही अब कोई उम्मीद नहीं
पराया छोड़िए,अपना भी मुँह को मोड़ गया
बड़ी उमीद से घर हमने जो सजाया था
लगी ये किसकी नज़र, कौन घर को फोड़ गया
किया था जिसपे भरोसा वो बेईमां निकला
डकार देश की निधि वो कई करोड़ गया
उठाया जिसने भी आवाज़ उसकी गर्दन को
चुपके आ पीछे से है कौन जो मरोड़ गया
करेगा ख़र्च भला कौन ये नहीं सोचा
गुनाह कर के मैं धन किसलिए यूँ जोड़ गया
गये हैं भूल ‘जय’ सभी अपनी संस्कृति क्यों
ये कौन शर्मों हया के शीशे को तोड़ गया
— जयराम जय
