राजनीति

क्या अमेरिका और ईरान ने वास्तव में शांति चुन ली है?

अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से चला आ रहा टकराव केवल दो देशों का विवाद नहीं रहा है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु प्रसार, समुद्री व्यापार और मध्य पूर्व की स्थिरता से जुड़ा एक ऐसा प्रश्न बन चुका है जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच तनाव जिस स्तर तक पहुंच गया था, उसे देखते हुए बहुत कम लोगों को उम्मीद थी कि अचानक कोई ऐसा समझौता सामने आएगा जो युद्धविराम का रास्ता खोल सके। लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान द्वारा डिजिटल हस्ताक्षर किए जाने के बाद एक अंतरिम समझौता लागू हो चुका है, जिसने कम से कम फिलहाल सैन्य संघर्ष को रोक दिया है और आगे की बातचीत के लिए 60 दिनों का समय प्रदान किया है।

यह समझौता केवल युद्ध रोकने का दस्तावेज नहीं है। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने, परमाणु कार्यक्रम पर वार्ता शुरू करने, आर्थिक प्रतिबंधों में संभावित राहत और क्षेत्रीय तनाव कम करने जैसे कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं। यही कारण है कि इस समझौते को कुछ लोग ऐतिहासिक सफलता बता रहे हैं, जबकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक अस्थायी विराम है और वास्तविक परीक्षा अभी बाकी है।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि होर्मुज जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है। यह दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। युद्ध के दौरान इस मार्ग पर संकट पैदा होने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई थी और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं उत्पन्न हो गई थीं। समझौते के तहत इस जलमार्ग को फिर से खोलने पर सहमति बनी है और कम से कम 60 दिनों तक जहाजों को बिना शुल्क गुजरने की अनुमति देने की बात कही गई है।

हालांकि समझौते का सबसे विवादास्पद पहलू वही है जिस पर अब दुनिया की नजर टिकी हुई है। ईरान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने स्पष्ट संकेत दिया है कि 60 दिनों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाया जा सकता है। उनका तर्क है कि ईरान इस क्षेत्र पर अपनी संप्रभुता का अधिकार रखता है और सुरक्षा तथा अन्य सेवाओं के बदले शुल्क लेना उसका अधिकार है। दूसरी ओर अमेरिका और कई पश्चिमी देश इस विचार से सहमत नहीं दिखते। यदि भविष्य में इस मुद्दे पर सहमति नहीं बनती, तो यह नया विवाद पैदा कर सकता है।

अब प्रश्न यह है कि इस समझौते में वास्तव में किसे झुकना पड़ा। यदि ईरानी दृष्टिकोण से देखा जाए तो तेहरान यह दावा कर सकता है कि उसने अपनी प्रमुख मांगों में से कई को सुरक्षित रखा है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम तत्काल समाप्त नहीं किया गया है। उसका संवर्धित यूरेनियम पूरी तरह नष्ट करने की शर्त भी स्वीकार नहीं की गई। इसके बजाय अंतरराष्ट्रीय निगरानी में आगे की प्रक्रिया तय करने पर सहमति बनी है। इसका अर्थ यह है कि ईरान ने अपनी मूल रणनीतिक क्षमता को पूरी तरह छोड़ा नहीं है।

इसके अतिरिक्त, ईरान को आर्थिक राहत मिलने की संभावना भी दिखाई दे रही है। तेल निर्यात पर कुछ प्रतिबंधों में ढील, जमी हुई संपत्तियों तक संभावित पहुंच और आर्थिक पुनर्निर्माण से जुड़ी चर्चाओं को ईरान अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। युद्ध और प्रतिबंधों के लंबे दौर के बाद यह तेहरान के लिए महत्वपूर्ण राहत मानी जाएगी।

लेकिन यदि अमेरिकी दृष्टिकोण से देखा जाए तो वाशिंगटन भी इस समझौते को अपनी जीत के रूप में पेश कर सकता है। अमेरिका का कहना है कि कठोर प्रतिबंधों, नौसैनिक दबाव और सैन्य कार्रवाई ने ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया। समझौते में ईरान द्वारा परमाणु हथियार विकसित न करने की प्रतिबद्धता दोहराई गई है तथा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी को स्वीकार करने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। अमेरिका के लिए यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा सकती है।

वास्तव में यदि निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए तो यह किसी एक पक्ष की पूर्ण जीत नहीं है। आधुनिक कूटनीति में अक्सर ऐसा होता है कि दोनों पक्ष कुछ प्राप्त करते हैं और कुछ छोड़ते हैं। यही इस समझौते में भी दिखाई देता है। अमेरिका को परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत और समुद्री मार्ग की बहाली मिली है, जबकि ईरान को युद्धविराम, संभावित आर्थिक राहत और अपनी कुछ रणनीतिक स्थितियों को बनाए रखने का अवसर मिला है।

इस समझौते का एक और महत्वपूर्ण पहलू 60 दिनों की वार्ता अवधि है। यही वह समय होगा जिसमें यह तय होगा कि अंतरिम समझौता स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ता है या नहीं। यदि दोनों पक्ष परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों, क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री मार्गों के उपयोग जैसे मुद्दों पर ठोस सहमति बना लेते हैं, तो यह मध्य पूर्व के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। लेकिन यदि वार्ता विफल होती है, तो संघर्ष दोबारा शुरू होने की आशंका भी बनी रहेगी।

दुनिया के कई देशों के लिए यह समझौता राहत की खबर है। ऊर्जा आयात करने वाले देशों को उम्मीद है कि तेल और गैस की आपूर्ति अधिक स्थिर होगी। अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक कंपनियां भी समुद्री मार्गों के सामान्य होने की प्रतीक्षा कर रही हैं। युद्ध के दौरान वैश्विक बाजारों में जो अनिश्चितता दिखाई दी थी, उसमें कुछ कमी आने की संभावना है।

हालांकि चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। समझौते में कई महत्वपूर्ण विषयों को भविष्य की बातचीत के लिए छोड़ दिया गया है। मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय सहयोगी समूहों की भूमिका, मानवाधिकार से जुड़े प्रश्न और दीर्घकालिक सुरक्षा व्यवस्था जैसे विषय अभी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इस समझौते को अंतिम समाधान के बजाय एक प्रारंभिक ढांचा मान रहे हैं।

इतिहास गवाह है कि अमेरिका और ईरान के संबंध लंबे समय से अविश्वास से भरे रहे हैं। अनेक बार बातचीत शुरू हुई, कई बार उम्मीदें जगीं, लेकिन अंततः विवाद फिर सामने आ गए। इस पृष्ठभूमि में वर्तमान समझौता निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, परंतु इसकी सफलता का आकलन केवल हस्ताक्षरों से नहीं किया जा सकता। असली सफलता तब मानी जाएगी जब आने वाले महीनों में दोनों देश अपने वादों का पालन करें और एक व्यापक तथा स्थायी समझौते तक पहुंचें।

निष्कर्ष यही है कि न तो अमेरिका पूरी तरह विजेता बनकर उभरा है और न ही ईरान पूरी तरह पराजित हुआ है। दोनों देशों ने अपनी-अपनी सीमाओं और आवश्यकताओं को समझते हुए एक व्यावहारिक रास्ता चुना है। युद्ध ने दोनों को नुकसान पहुंचाया था और शांति की दिशा में बढ़ना दोनों की आवश्यकता बन गया था। इसलिए इस समझौते को किसी एक की जीत और दूसरे की हार के रूप में देखने के बजाय इसे एक ऐसे राजनीतिक समझौते के रूप में देखना अधिक उचित होगा जिसमें दोनों पक्षों ने अपने-अपने हितों की रक्षा करते हुए टकराव को फिलहाल रोकने का निर्णय लिया है। आने वाले 60 दिन यह तय करेंगे कि यह समझौता इतिहास में स्थायी शांति के पहले कदम के रूप में दर्ज होगा या केवल युद्ध के बीच आया एक अस्थायी विराम साबित होगा।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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