रुल रेगूलेशन
आज बहुत दिनों बाद मिस्टर शर्मा पार्क पर दिखाई दिये। वे मेरे पास आकर मुझ से हाथ मिलाने लगे तो मैंने कहा “बहुत दिनों बाद देखा आपको”। उन्होंने मानो चहकते हुए कहा हां हां, मैं यहां था नहीं, मैं अपने बेटे पास यूएस गया था। पूरे पन्द्रह दिन रह कर आया।
मैंने भी आश्चर्य से कहा, “अच्छा, कैसा लगा आपको वहां?”
“बहुत ही अच्छा लगा । क्या सड़कें हैं वहां की, एकदम चमचमाती, चारों ओर सफाई ही सफाई और वहां के रुल रेगूलेशन का तो क्या कहना। इंसान नियमों से ही बंधा है, वहां।”
तभी एक भेल बेचने वाला वहां आया। मैंने हम दोनों के लिए भेल लिया, हमने भेल खाया। हमारे कुछ ही दूरी पर कार्टूननुमा कचरे का डिब्बा “कृपया कचरा मुझे दें” की तख्ती लिए खड़ा है, फिर भी मिस्टर शर्मा ने भेल का खाली कागज मोड़कर जमीन पर फेंक दिया और चलते बने। मुझे भी बड़ा गुस्सा आया तो कह दिया, “वाह, शर्मा जी रुल रेगूलेशन तो हमारे देश में भी है, पर हम नियमों से आजाद हैं।” एक खिसियानी हंसी फेंककर वो आगे बढ़ गये। मैं ठगा सा रह गया।
— अमृता राजेंद्र प्रसाद
