कविता

ये सफ़र

ये सफ़र कुछ अलग सा है,
कभी धूप की चादर, कभी छाँव सा है।
रास्ते भी अनजाने, मंज़िल भी दूर,
फिर भी दिल में उम्मीद का नूर सा है।

कभी अपने साथ चलते-चलते बिछड़ जाते हैं,
कुछ चेहरे यादों में घर कर जाते हैं।
कभी हँसी के पल दिल को सजा जाते हैं,
तो कभी आँसू चुपके से सब कह जाते हैं।

हर मोड़ पर ज़िन्दगी कुछ नया सिखाती है,
गिरकर संभलना ही हिम्मत कहलाती है।
थक जाए अगर मन, तो ठहरना भी ज़रूरी है,
पर सपनों की राह में चलना भी ज़रूरी है।

ये सफ़र सिर्फ़ रास्तों का नाम नहीं,
ये टूटकर फिर सँवरने का पैग़ाम सही।
जो हर हाल में मुस्कुरा कर चल पड़े,
उसके लिए कोई अँधेरा शाम नहीं।

चलते रहो, चाहे राह मुश्किल लगे,
हर रात के बाद नया सवेरा जगे।
क्योंकि ज़िन्दगी का असली मतलब यही है,
सफ़र में खुद को पाना ही सबसे सही है।
✍️हेमंत सिंह कुशवाह

हेमंत सिंह कुशवाह

राज्य प्रभारी मध्यप्रदेश विकलांग बल मोबा. 9074481685