मिसाइल युग में भारत की सामरिक चुनौती
समकालीन विश्व व्यवस्था में सैन्य शक्ति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी किसी राष्ट्र की सामरिक क्षमता का मूल्यांकन सैनिकों की संख्या, टैंकों, युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों से किया जाता था, लेकिन आज परिस्थितियाँ भिन्न हैं। आधुनिक युद्ध तकनीक, सटीक प्रहार क्षमता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष आधारित निगरानी, साइबर सुरक्षा तथा लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल प्रणालियाँ किसी भी देश की वास्तविक शक्ति का आधार बन चुकी हैं। ऐसे समय में भारत के समक्ष सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौतियों में से एक चीन की निरंतर बढ़ती मिसाइल क्षमता है। यह चुनौती केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के सामरिक संतुलन, राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
पिछले दो दशकों में चीन ने अपनी मिसाइल शक्ति को योजनाबद्ध ढंग से विकसित किया है। उसने पारंपरिक और सामरिक दोनों प्रकार की मिसाइल प्रणालियों का व्यापक विस्तार किया है। तिब्बत और शिनजियांग जैसे क्षेत्रों में स्थापित मिसाइल ठिकाने भारत के उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। इन ठिकानों से कम समय में सटीक प्रहार करने की क्षमता चीन को सामरिक बढ़त प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त ध्वनि की गति से कई गुना अधिक वेग से चलने वाली अत्याधुनिक मिसाइलों तथा लंबी दूरी तक बिना चेतावनी के लक्ष्य भेदने वाली प्रणालियों का विकास भविष्य के युद्धों की प्रकृति को पूरी तरह बदल रहा है।
भारत ने भी इस चुनौती को गंभीरता से समझते हुए अपनी रक्षा तैयारियों को निरंतर मजबूत किया है। लंबी दूरी तक मार करने वाली अग्नि श्रृंखला, अत्यंत तीव्र गति वाली ब्रह्मोस मिसाइल, प्रलय, निर्भय तथा स्वदेशी वायु एवं मिसाइल रक्षा प्रणाली जैसी परियोजनाएँ भारत की सामरिक क्षमता को नई दिशा प्रदान कर रही हैं। इन उपलब्धियों ने यह सिद्ध किया है कि देश केवल आयातित रक्षा उपकरणों पर निर्भर रहने के बजाय स्वदेशी अनुसंधान और तकनीकी विकास को प्राथमिकता दे रहा है। फिर भी बदलते वैशिक सुरक्षा वातावरण में केवल हथियारों का संग्रह पर्याप्त नहीं माना जा सकता। आधुनिक युद्ध में सूचना, तकनीक और त्वरित निर्णय क्षमता समान रूप से महत्वपूर्ण हो चुकी है।
युद्ध की बदलती प्रकृति यह संकेत देती है कि भविष्य के संघर्ष केवल सीमाओं पर आमने-सामने की लड़ाई तक सीमित नहीं रहेंगे। किसी भी राष्ट्र की ऊर्जा व्यवस्था, संचार नेटवर्क, औद्योगिक प्रतिष्ठान, हवाई अड्डे, रेलवे प्रणाली तथा डिजिटल अवसंरचना प्रारंभिक लक्ष्य बन सकते हैं। ऐसी स्थिति में वास्तविक समय पर आधारित खुफिया जानकारी, उपग्रह निगरानी, सटीक लक्ष्य निर्धारण तथा त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बन जाते हैं। यदि किसी देश के पास आधुनिक मिसाइलें हों, लेकिन उन्हें सही समय पर सही लक्ष्य तक पहुँचाने की क्षमता सीमित हो, तो उसकी सामरिक शक्ति भी सीमित रह जाती है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका वैज्ञानिक आधार और अनुसंधान क्षमता है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रम, निजी उद्योग, नवाचार आधारित कंपनियाँ तथा उच्च शिक्षण संस्थान मिलकर रक्षा प्रौद्योगिकी को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में रक्षा निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से अनुसंधान की गति, उत्पादन क्षमता तथा प्रतिस्पर्धा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे देश में आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग के निर्माण को नई ऊर्जा मिली है।
फिर भी अनेक चुनौतियाँ अभी शेष हैं। उच्च गुणवत्ता वाले अर्धचालक, विशेष मिश्रधातु, उन्नत प्रणोदन प्रणाली, अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तथा उच्च तकनीक वाले रक्षा घटकों के निर्माण में भारत अभी पूर्ण आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर अत्यधिक निर्भरता किसी भी संकट की स्थिति में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम उत्पन्न कर सकती है। इसलिए अनुसंधान एवं विकास में निवेश, घरेलू विनिर्माण क्षमता का विस्तार तथा रक्षा उद्योग और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
आधुनिक युद्ध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है। लक्ष्य पहचान, खुफिया विश्लेषण, युद्धक्षेत्र का मूल्यांकन, स्वचालित निगरानी तथा निर्णय प्रक्रिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। इसी प्रकार अंतरिक्ष आधारित उपग्रह नेटवर्क किसी भी सैन्य अभियान की सफलता के लिए अनिवार्य बन चुके हैं। भारत को इन दोनों क्षेत्रों में निरंतर निवेश करते हुए भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी तकनीकी क्षमता का विस्तार करना होगा।
रक्षा विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि तीनों सेनाओं के बीच अधिक समन्वित संचालन व्यवस्था विकसित करना समय की आवश्यकता है। संयुक्त कमान व्यवस्था, साझा खुफिया तंत्र, एकीकृत लक्ष्य निर्धारण प्रणाली तथा संसाधनों का सामूहिक उपयोग किसी भी संभावित संघर्ष में भारत की सामरिक क्षमता को कई गुना बढ़ा सकता है। आधुनिक युद्ध व्यक्तिगत सेनाओं के नहीं, बल्कि एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के होते हैं।
भारत की रक्षा नीति की सबसे बड़ी विशेषता उसका संतुलित दृष्टिकोण है। देश एक ओर अपनी सामरिक शक्ति का आधुनिकीकरण कर रहा है, वहीं दूसरी ओर शांति, संवाद और कूटनीतिक समाधान को भी समान महत्व देता है। किसी भी जिम्मेदार लोकतांत्रिक राष्ट्र का उद्देश्य युद्ध को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर युद्ध की संभावना को कम करना होता है। यही कारण है कि भारत अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के साथ-साथ क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का भी समर्थन करता है।
इक्कीसवीं शताब्दी में राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सेना की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्योग, शिक्षा, नवाचार, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान और आर्थिक आत्मनिर्भरता भी समान रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा के अभिन्न अंग बन चुके हैं। यदि किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था मजबूत हो, वैज्ञानिक संस्थान सक्षम हों, उद्योग प्रतिस्पर्धी हो और अनुसंधान निरंतर आगे बढ़ रहा हो, तो उसकी रक्षा क्षमता स्वतः अधिक सुदृढ़ हो जाती है।
भारत के पास प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों, कुशल अभियंताओं, विशाल युवा शक्ति और तेजी से विकसित हो रहे तकनीकी उद्योग का मजबूत आधार मौजूद है। आवश्यकता इस बात की है कि इन सभी क्षमताओं को एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के अंतर्गत संगठित किया जाए। रक्षा अनुसंधान में निरंतर निवेश, स्वदेशी तकनीकों का विकास, निजी उद्योग को प्रोत्साहन तथा उच्च तकनीकी शिक्षा में सुधार भारत को भविष्य की चुनौतियों के लिए अधिक सक्षम बना सकते हैं।
अंततः चीन की बढ़ती मिसाइल क्षमता भारत के लिए केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और आधुनिक रक्षा व्यवस्था के निर्माण का अवसर भी है। यह समय वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, औद्योगिक क्षमता, रणनीतिक दूरदृष्टि और प्रभावी नीति निर्माण को एक साथ आगे बढ़ाने का है। भविष्य का युद्ध केवल हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि ज्ञान, तकनीक, संगठन, आत्मनिर्भरता और दूरदर्शी नेतृत्व से जीता जाएगा। यदि भारत इन सभी क्षेत्रों में संतुलित और निरंतर प्रगति करता है, तो वह न केवल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को अधिक सुदृढ़ बना सकेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में एक जिम्मेदार, सक्षम और प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में अपनी भूमिका भी और अधिक मजबूत करेगा।
— अवनीश कुमार गुप्ता
