इस राजनीति के लाभार्थी कौन
भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता रहा है, हमारे देश की पहचान विविधता, बहुलता और सहिष्णुता से रही है।हमारे देश में अनेक धर्म, जातियां, भाषाएं और संस्कृतियां एक साथ मिलकर देश को मजबूत बनाती रही हैं।लेकिन हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति का स्वर तेजी से बदला है। विकास, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों की जगह नफरत, डर और विभाजन ने राजनीतिक विमर्श में प्रमुख स्थान ले लिया है, चुनावी भाषणों से लेकर सोशल मीडिया तक, हम बनाम वे ,की भाषा सामान्य होती जा रही है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि नफरत की राजनीति आखिर है क्या, इससे किसे फायदा हो रहा है और इसका असर भारत के भविष्य पर कितना गंभीर है। कई विद्वानों के मुताबिक नफरत की राजनीति या हेट पॉलिटिक्स वह रणनीति है जिसमें राजनीतिक लाभ के लिए समाज के किसी एक वर्ग को दूसरे वर्ग के खिलाफ खड़ा किया जाता है। इसमें धर्म, जाति, समुदाय, भाषा या क्षेत्र के आधार पर लोगों को बांटा जाता है। अल्पसंख्यक समुदायों को अक्सर,खतरा, घुसपैठिया या राष्ट्र विरोधी बताकर बहुसंख्यक समाज को डर और असुरक्षा की भावना से जोड़ा जाता है। यह राजनीति तर्क और नीति के बजाय भावनाओं को भड़काने पर आधारित होती है, ताकि वोट बैंक मजबूत किया जा सके। भारत में विभाजन की राजनीति कोई नई बात नहीं है। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश शासन ने, फूट डालो और राज करो, की नीति अपनाई, जिससे समाज में धार्मिक और सामाजिक दरारें गहरी हुईं। आज़ादी के बाद भी समय-समय पर कुछ राजनीतिक ताकतों ने इन दरारों का इस्तेमाल सत्ता हासिल करने के लिये किया। 1980 और 1990 के दशक में सांप्रदायिक राजनीति ने धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमाईं, लेकिन पिछले एक दशक में यह राजनीति हाशिये से निकलकर मुख्यधारा में आ गई है।अब यह केवल चुनावी समय तक सीमित नहीं, बल्कि रोजमर्रा के सामाजिक जीवन का हिस्सा बनती जा रही है।हम और आपके मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस राजनीति के लाभार्थी कौन हैं।सबसे पहले राजनीतिक दल, जो धार्मिक या जातीय ध्रुवीकरण के जरिए स्थायी वोट बैंक तैयार करते हैं। और कुछ ही समय में हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति इकट्ठा कर लेते हैं। देश की जनता को क्या मिलता है। सिर्फ झूठे वादे। गौरतलब है कि जब जनता भावनात्मक मुद्दों में उलझी रहती है, तब बेरोजगारी, शिक्षा, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे असली सवाल पीछे छूट जाते हैं।दूसरा बड़ा लाभार्थी मीडिया का एक हिस्सा है, जिसे सनसनीखेज बहसों और विवादों से टीआरपी और क्लिक मिलता हैं।यू-ट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म के एल्गोरिदम के मुताबिक नफरत भरा कंटेंट जल्दी वायरल होता है, जिससे विज्ञापन का खेल चलता रहता है।फ्रिंज एलिमेंट डालरों में कमाई करते है। इसके अलावा संगठित ट्रोल समूह और आईटी सेल भी इस माहौल में फलते-फूलते हैं, जिन्हें राजनीतिक संरक्षण और पहचान मिलती है। गौरतलब है कि देश और समाज में नफरत रातोंरात पैदा नहीं होती। इसकी शुरुआत चुपचाप होती है- यानी रोजमर्रा के पूर्वाग्रहों, रूढ़ियों, असंवेदनशील टिप्पणियों, अलगाववादी भाषा और भिन्नता के डर से। अगर इन पूर्वाग्रहों को रोका न जाए, तो ये भेदभाव, हिंसा और अंततः पूरे समुदायों को निशाना बनाने में बदल जाते हैं। कई विद्वानों ने देश और समाज में नफरत के पिरामिड का विश्लेषण किया है, जिसके पांच प्रकार है। नफरत का पिरामिड यह दर्शाता है कि कैसे नफरत भरे बयान और गलत सूचनाएं समाज में विभाजन को बढ़ावा देती हैं और शत्रुता को सामान्य बना देती हैं। यह इस बात का भी जिक्र करता है कि आम नागरिक सामूहिक रूप से कैसे इसका मुकाबला कर सकते हैं- आवाज उठाकर, समुदायों के बीच विश्वास बनाकर और मोहल्ला समितियों जैसी पहलों को मजबूत करके, जो अफवाहों को रोकने, नफरत का मुकाबला करने और मोहल्ले के स्तर पर शांति बनाए रखने के लिए काम करती हैं।नफरत अक्सर देखने में छोटे लगने वाले पूर्वाग्रहों और पक्षपातों से शुरू होती है – यानी किसी को उसकी बनावट, तौर-तरीकों, या उसके पूजा करने के तरीके के आधार पर आंकना। फिर भी, इन रवैयों में पूरे समाज को अपनी चपेट में लेने की क्षमता होती है। मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सेतलवाड़ कहती हैं, “ये ही पक्षपाती रवैये – रूढ़िवादिता, असंवेदनशील टिप्पणियां, अलग होने का डर, गैर-समावेशी भाषा, बड़े पैमाने पर होने वाले आक्रामक व्यवहार और अपनी जैसी सोच वाले लोगों को ढूंढकर अपने पूर्वाग्रहों को सही ठहराने की प्रवृत्ति – अंततः नफरत का रूप ले लेते हैं।यह पक्षपाती मानसिकता नफरत के पिरामिड का पहला चरण बनाती है।दूसरे चरण में पूर्वाग्रह से भरे कार्य शामिल होते हैं, जिनमें नाम लेकर चिढ़ाना, सामाजिक बहिष्कार करना और अपमानजनक मज़ाकों तथा रोजमर्रा के अपमान के जरिए कुछ खास समुदायों को निशाना बनाना शामिल है। नफरत के पिरामिड का तीसरा चरण भेदभाव का है, जहां समुदायों को नस्ल, यौन रुझान, जाति, वर्ग, धर्म और अन्य पहचानों के आधार पर आवास, रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में उत्पीड़न, धमकाने और बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।नफरत के पिरामिड’ का चौथा चरण हिंसा है – इसमें जान-बूझकर किए गए नफरती अपराध शामिल हैं, जैसे धमकियां देना,एक समुदाय की दुकानों पर हमला करना, मारपीट, हत्या और आतंकवाद। हाल ही में एक सोशल मीडिया लाइव सेशन में, सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सेतलवाड़ ने बताया कि भारत पहले ही इस चौथे चरण में प्रवेश कर चुका है; ऐसे में हर जिम्मेदार नागरिक के लिए यह बेहद जरूरी हो गया है कि वह संस्थागत नफरत को लेकर अपनी चुप्पी तोड़े।नफरत के पिरामिड का पांचवां और अंतिम चरण है नरसंहार: किसी समुदाय को जान-बूझकर और सुनियोजित तरीके से पूरी तरह से खत्म कर देना।गलत जानकारी और नफरत भरे बयान, लोगों को गुमराह करने, आपसी मतभेद बढ़ाने और समाज में अफरा-तफरी मचाने के दो शक्तिशाली हथियार हैं।
भारत की असली ताकत उसकी विविधता और एकता में है। नफरत की राजनीति से भले ही कुछ राजनीतिक और आर्थिक हित पूरे हो जाये , लेकिन इसका खामियाजा पूरे देश को लम्बे समय तक भुगतना पड़ता है। अगर भारत को एक मजबूत, न्यायपूर्ण और समावेशी राष्ट्र बनाना है, तो राजनीति को नफरत से निकालकर विकास, समानता और संवाद की राह पर लाना होगा। यही लोकतंत्र की रक्षा और देश के उज्ज्वल भविष्य का एकमात्र रास्ता है। जय हिंद जय भारत।
— जुनैद मलिक अत्तारी
