कहानी

मोक्ष की तलाश

मैं अपने बीमार और वृद्ध पिता को काशी के मुक्ति भवन ले जा रहा था। मन में एक ही उम्मीद थी—शायद वहाँ जाकर उनका जल्दी देहांत हो जाए।
ऐसा नहीं था कि मैं वहाँ जाना चाहता था। लेकिन पिता की लगातार बीमारी, उनकी बढ़ती कमजोरी और दवाइयों तथा इलाज का अंतहीन खर्च मुझे भीतर तक तोड़ चुका था। उनकी देखभाल में मैं अपनी सामर्थ्य से कहीं अधिक खर्च कर चुका था, और अब मुझे लगने लगा था कि मैं यह सब और नहीं कर पाऊँगा।
उसी समय मेरे एक घनिष्ठ मित्र ने मुझे काशी के मुक्ति भवन के बारे में बताया। उसने कहा, “हिंदू मान्यता के अनुसार काशी में मृत्यु होने से मोक्ष प्राप्त होता है। मुक्ति भवन उन सबसे प्रसिद्ध स्थानों में से एक है, जहाँ लोग अपने जीवन के अंतिम दिन बिताने आते हैं। अगर तुम अपने पिता को वहाँ ले जाओगे, तो तुम्हें भी शांति मिलेगी और तुम्हारे पिता को भी मोक्ष प्राप्त होगा।”
और एक दिन मैं अपने पिता को लेकर ट्रेन में बैठ गया। पिता खिड़की के पास बैठे बाहर देख रहे थे। उनके चेहरे पर थकान साफ़ झलक रही थी, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब-सी शांति थी।
उन्होंने मुस्कुराकर पूछा, “बेटा, हम कहाँ जा रहे हैं?”
मैंने उत्तर दिया, “काशी।”
“काशी? अरे, मेरे महादेव! इस यात्रा की इच्छा तो मुझे न जाने कितने वर्षों से थी।”
उनके चेहरे पर फैलती खुशी ने मेरे हृदय को चीर दिया। लेकिन मैंने अपने मन को कठोर बनाए रखा। पूरे सफ़र में पिता बीते दिनों की बातें करते रहे। उन्होंने बताया कि बचपन में जब मुझे तेज़ बुखार आया था, तो वे कई रातें अस्पताल में मेरे सिरहाने बैठे रहे थे। उन्होंने याद दिलाया कि मेरी माँ ने मेरी स्कूल की फीस भरने के लिए अपने कंगन बेच दिए थे। उन्होंने यह भी बताया कि मुझे साइकिल दिलाने के लिए वे रात-रात भर ऑटो-रिक्शा चलाते रहे थे। मैं सब सुनता रहा। लेकिन मेरे पास कहने के लिए बहुत कम शब्द थे।
लंबी यात्रा के बाद हम वाराणसी पहुँचे और मुक्ति भवन पहुँचे। मैंने सोचा था कि वहाँ मौत जैसी भयावह खामोशी होगी। लेकिन वहाँ जो देखा, वह बिल्कुल अलग था। छोटे-छोटे कमरे। सफेद दीवारें। धीरे-धीरे घूमते पुराने पंखे। गलियारों में साधु-संत उन लोगों के लिए मंत्रोच्चार कर रहे थे, जो अपनी अंतिम घड़ियों की प्रतीक्षा कर रहे थे। मैंने पिता को उनके कमरे में आराम से लिटा दिया।
उन्होंने कहा, “मैं बहुत थक गया हूँ, बेटा। थोड़ी देर सोने दो।”
मैंने सिर हिला दिया। जैसे ही वे सो गए, मैंने अपना बैग उठाया और चुपचाप बाहर निकल पड़ा।
बिना पीछे मुड़े तेज़ी से चलते हुए मेरी नज़र एक आधे खुले कमरे पर पड़ी।
अंदर एक वृद्ध व्यक्ति खिड़की के पास बैठा था। उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी—शायद उसकी पत्नी या बच्चों की। वह बार-बार तस्वीर को देखता और हल्की मुस्कान बिखेर देता।
दूसरे कमरे में एक बुज़ुर्ग महिला आँखें बंद किए हाथ में माला लिए भगवान का नाम जप रही थी।
उसके पास कोई नहीं था। लेकिन वह अकेली भी नहीं थी। उसकी यादें उसके साथ थीं।
गलियारे के अंत में एक वृद्ध पिता बिस्तर पर लेटे थे। उनके पास एक युवक उनका हाथ पकड़े बैठा था। वह बार-बार कह रहा था, “पिताजी… मैं यहीं हूँ। डरिए मत।”
मुझे नहीं पता कि वृद्ध पिता उसकी आवाज़ सुन पा रहे थे या नहीं। लेकिन बेटे की आवाज़ में प्रेम साफ़ महसूस हो रहा था।
वहाँ मौजूद हर व्यक्ति मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था। लेकिन मुझे लगा, उनमें से अधिकांश किसी और चीज़ की प्रतीक्षा कर रहे थे। एक फ़ोन कॉल की। किसी अपने के आने की। बेटे के दो सांत्वना भरे शब्दों की। या बेटी की उस पुकार की— “पिताजी…” असल में वे उसी का इंतज़ार कर रहे थे।
तभी वहाँ काम करने वाले एक कर्मचारी ने मुझसे कहा, “साहब, यहाँ आने वाले ज़्यादातर लोग मौत से नहीं डरते। उन्हें सबसे ज़्यादा तकलीफ़ इस बात की होती है कि उनके अपने उन्हें भूल चुके हैं। लोग कहते हैं कि यहाँ मरने से मोक्ष मिलता है, लेकिन अपने बच्चों के बीच प्रेम और सम्मान के साथ मृत्यु पाने और यहाँ अकेले मरने में बहुत बड़ा अंतर है।”
वह आगे बोला, “यहाँ आने वाले कई लोग बीमारी से कम, और इस एहसास से ज़्यादा मर जाते हैं कि उनके बच्चों ने उन्हें छोड़ दिया है।”
उसकी बातें सुनकर मैं भीतर तक हिल गया। मैंने चारों ओर देखा। कुछ आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं— मानो किसी के आने का इंतज़ार हो। कुछ आँखें आसमान की ओर थीं— मानो कोई पुकार ले।
और कुछ आँखों में अब कोई उम्मीद नहीं बची थी। सिर्फ़ इंतज़ार।
अचानक मुझे अपने पिता का ख़याल आया। मैं दौड़ता हुआ वापस उनके कमरे में पहुँचा। वे पसीने से भीगे हुए बिस्तर पर बैठे थे। बहुत कमज़ोर दिखाई दे रहे थे। और वे भी उसी खुले दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए देख रहे थे। जैसे ही उन्होंने मुझे देखा, उन्होंने राहत की लंबी साँस ली। उसी क्षण मेरे मन में विचार आया— अगर मैं अभी चला जाता, तो क्या कल मेरे पिता भी उसी दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए किसी का इंतज़ार करने वाले एक और चेहरे में बदल नहीं जाते? उस पल मुक्ति भवन मुझे केवल एक इमारत नहीं लगा। वह उन लोगों की मौन दुनिया लगी, जिन्होंने पूरी ज़िंदगी दूसरों के लिए जी, और अंत में केवल एक अंतिम स्पर्श, थोड़ा-सा प्रेम और अपनेपन का इंतज़ार करते रह गए।
मैं इन्हीं विचारों में खोया था कि पिता ने पुकारा— “बेटा…”
“जी, पिताजी?”
“तुम… गए नहीं?”
“मैं कहाँ जाता?”
उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “मुझे पता है… तुम मुझे यहाँ छोड़ने ही लाए थे।” कुछ पल रुककर बोले, “लेकिन मैं तुम्हें दोष नहीं देता। जब माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं, तो कभी-कभी अपने बच्चों पर बोझ बन जाते हैं। शायद मैं भी तुम्हारे लिए बोझ बन गया हूँ।”
फिर उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। “लेकिन एक बात हमेशा याद रखना, बेटा…” “माता-पिता का सबसे बड़ा मोक्ष काशी में मरना नहीं है…” “उनके बच्चों के दिल से कभी न निकलना ही उनका सच्चा मोक्ष है।” “मुझसे नफ़रत मत करना, बेटा। मेरे जाने के बाद मेरे अंतिम संस्कार और सारे कर्मकांड कर देना।” उनकी बातें मेरे हृदय को चीर गईं।
फिर उन्होंने कहा, “ज़्यादा देर मत रुकना, बेटा। अगर जाना हो तो चले जाना… लेकिन जाने से पहले अपने पिता को एक बार गले लगा लेना… और एक प्यार दे देना। तुम्हें एक बार फिर बाँहों में भर लेने का मन कर रहा है।”
उनकी यह अंतिम इच्छा थी। “पिताजी…” मैं फूट-फूटकर रो पड़ा। मेरी वर्षों की स्वार्थपरता, मेरे सारे हिसाब-किताब, मेरे आँसुओं में बह गए। उस रात मैं मुक्ति भवन के उसी कमरे में अपने पिता के पास सोया। उनके सोते हुए चेहरे की झुर्रियों को देखते-देखते मुझे एक सच्चाई समझ में आई—
मेरे जीवन की सबसे सुरक्षित जगह कभी इन्हीं के कंधे थे। डर लगता था तो यही मुझे अपनी बाँहों में उठा लेते थे। गिर जाता था तो यही संभालते थे। हार जाता था तो यही मेरा हाथ पकड़कर खड़े हो जाते थे। फिर मैं इन्हें इनके जीवन की अंतिम घड़ियों में अकेला कैसे छोड़ सकता था?
अगली सुबह मैंने घर लौटने के टिकट बुक कर लिए। जब हम जाने लगे, तो मुक्ति भवन के कर्मचारियों ने पिता की शांतिपूर्ण मृत्यु के लिए साधुओं को बुलाया। मैंने उन्हें रोक दिया।
मैंने कहा, “अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।” “मोक्ष मेरे पिता को नहीं मिला है…” “मोक्ष तो मुझे मिला है।”
पिता ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा। “क्या मतलब है तुम्हारा, बेटा?”
मैंने उनका हाथ थाम लिया। “चलिए, पिताजी… घर चलते हैं। लेकिन पहले गंगा स्नान करेंगे और बाबा विश्वनाथ के दर्शन करेंगे।”
उन्होंने मासूमियत से पूछा, “तो… मुझे यहाँ नहीं रहना पड़ेगा?”
मैं मुस्कुरा दिया। “आप क्यों रहेंगे?” “जिसे मुक्ति की ज़रूरत थी, वह आप नहीं थे…” “वह मेरा मन था… जिसने अपने ही पिता को बोझ समझ लिया था।”
पिता की आँखों से आँसू बह निकले। उस क्षण काशी के मंदिरों की घंटियों से भी अधिक पवित्र वह मौन आँसू था, जो उस वृद्ध पिता के चेहरे पर लुढ़क आया।

— संकलित

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