गौरव का इतिहास
गौरव का इतिहास चाहिए
वेद, पुराण बहुत बाँचा है, गीता ज्ञान सदा है बांटा।
सत्य, अहिंसा की फसलों को,छिपी हुई दीमक ने चाटा।
शौर्य भरा पथ हमें दिखाए, ऐसा दर्शन पास चाहिए।
देश में हीन भावना भरके, विदेशियों ने राज किया है।
हमने उसी मानसिकता में, निज का गौरव भुला दिया है।
बुझी हुई चिंगारी में जो, कविता फूंके श्वास चाहिए।
राम, शिवाजी के हम वंशज, जिनकी विजय पताका फहरी।
उन्हें कलंकित करने की अब,चाल चल रहे दुश्मन गहरी।
सदियों लम्बी परंपरा से, नहीं हास-परिहास चाहिए।
छोड़ मोह निद्रा को अपनी, करवट काल बदलने वाला।
हिंदुत्व के प्रखर ज्ञान का, फैल रहा चहुँ और उजाला।
भारत पुनः विश्व गुरु होगा, ऐसा दृढ़ विश्वास चाहिए।
— प्रेम चन्द्र शुक्ल
