गीत/नवगीत

गौरव का इतिहास

गौरव का इतिहास चाहिए

वेद, पुराण बहुत बाँचा है, गीता ज्ञान सदा है बांटा।
सत्य, अहिंसा की फसलों को,छिपी हुई दीमक ने चाटा।
शौर्य भरा पथ हमें दिखाए, ऐसा दर्शन पास चाहिए।

देश में हीन भावना भरके, विदेशियों ने राज किया है।
हमने उसी मानसिकता में, निज का गौरव भुला दिया है।
बुझी हुई चिंगारी में जो, कविता फूंके श्वास चाहिए।

राम, शिवाजी के हम वंशज, जिनकी विजय पताका फहरी।
उन्हें कलंकित करने की अब,चाल चल रहे दुश्मन गहरी।
सदियों लम्बी परंपरा से, नहीं हास-परिहास चाहिए।

छोड़ मोह निद्रा को अपनी, करवट काल बदलने वाला।
हिंदुत्व के प्रखर ज्ञान का, फैल रहा चहुँ और उजाला।
भारत पुनः विश्व गुरु होगा, ऐसा दृढ़ विश्वास चाहिए।

— प्रेम चन्द्र शुक्ल

प्रेम चन्द्र शुक्ल

यूको बैंक में प्रबंधक के दायित्व से वर्ष 2011में अवकाश प्राप्त किया 1981 में योग में डिप्लोमा किया 1977 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक द्वितीय वर्ष प्रशिक्षित नगर व जिला स्तर पर विभिन्न दायित्वों का निर्वहन, वर्तमान में लखनऊ उत्तर भाग में परिवार प्रबोधन का कार्य। पता: एमएम 178, सेक्टर डी, अलीगंज, लखनऊ (226024) चल भाष: 7652045355