मुखौटों का समाज
मुख पर कितने रंग हैं, भीतर सूना गाँव।
सच की पगडंडी मिली, छोड़ गए सब ठाँव॥
सेवा यदि हो नाम की, कैसा वह उपकार।
सेल्फ़ी लेकर बाँटते, बस झूठा सत्कार॥
मंदिर-मस्जिद घूमते, मन रहता वीरान।
करुणा बिन इंसान का, कैसा है सम्मान॥
दया न पहुँची हाथ तक, पहुँचा पहले फ़ोन।
मानवता की हार पर, हँसता बैठा कौन॥
कपड़ों से पहचान क्या, नीयत ही पहचान।
भीतर उजियारा जगे, तब मिलता भगवान॥
मौन पुकारे प्रेम को, सुन ले रे इंसान।
मुखौटे सभी छोड़ दे, बन जा तू इंसान॥
मुख पर कितने रंग हैं, भीतर सूना गाँव।
सच की पगडंडी मिली, छोड़ गए सब ठाँव॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
