चुनावों के समय ही अनुसूचित जाति जनजातियों वर्गों के साथ छलावा क्यों?
चुनावों के समय अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्गों के साथ होने वाले छलावे या राजनीतिक लोकलुभावनवाद के पीछे मुख्य रूप से वोट बैंक की राजनीति, सामाजिक-आर्थिक निर्भरता और चुनावी रणनीतियाँ ज़िम्मेदार हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह एक जटिल मुद्दा है, जिसे निम्नलिखित प्रमुख कारणों से समझा जा सकता है–
- बड़ा और निर्णायक वोट बैंक चुनावी गणित: भारत की जनसंख्या में SC और ST वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। कई विधानसभा और लोकसभा सीटों पर इस वर्ग के मतदाता हार-जीत तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। समय-बद्ध सक्रियता: राजनीतिक दल पूरे पाँच साल इनके मुद्दों पर मौन रह सकते हैं, लेकिन चुनाव आते ही सत्ता पाने या बचाने के लिए इस बड़े समूह को लुभाना उनकी मजबूरी बन जाता है।
- नीतिगत वादों और ज़मीनी हकीकत में अंतर घोषणापत्रों की राजनीति: चुनावों के दौरान राजनीतिक दल मुफ्त योजनाओं, विशेष भत्तों, नौकरियों और विकास पैकेजों की झड़ी लगा देते हैं। क्रियान्वयन का अभाव: चुनाव जीतने के बाद इन वादों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। बजट का सही आवंटन न होना और प्रशासनिक ढीलापन इन वर्गों तक वास्तविक लाभ नहीं पहुँचने देता, जिससे इन्हें छलावे का अहसास होता है।
- सामाजिक और आर्थिक निर्भरता कमज़ोर आर्थिक स्थिति: इस वर्ग का एक बड़ा हिस्सा आज भी गरीबी, भूमिहीनता और बुनियादी सुविधाओं (शिक्षा, स्वास्थ्य) के अभाव से जूझ रहा है।तात्कालिक लाभ का जाल: आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के कारण ये वर्ग चुनावों के समय मिलने वाले तात्कालिक लाभों (जैसे मुफ्त राशन, नकद ट्रांसफर या अन्य उपहारों) के प्रति संवेदनशील होते हैं, जिसका राजनीतिक दल फायदा उठाते हैं।
- केवल प्रतीकात्मक राजनीति चेहरों का इस्तेमाल: चुनाव आते ही राजनीतिक दल इस वर्ग के नेताओं को मंच पर आगे करते हैं, उनके घरों पर भोजन करने के कार्यक्रम आयोजित करते हैं या प्रतीकात्मक सम्मान देते हैं।वास्तविक सशक्तिकरण की कमी: इस प्रतीकात्मक सम्मान के पीछे वास्तविक मंशा नीतिगत सुधार या इस वर्ग को नीति-निर्माण के मुख्य पदों पर बैठाने की नहीं होती, बल्कि केवल उनके समुदाय का वोट हासिल करने की होती है।
- जागरूकता और संगठित आवाज़ की कमी शिक्षा का स्तर: हालांकि शिक्षा और जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों (विशेषकर जनजातीय इलाकों) में आज भी राजनीतिक अधिकारों और सरकारी नीतियों के प्रति पूर्ण जागरूकता का अभाव है।विभाजन की राजनीति: राजनीतिक दल अक्सर इस वर्ग को भी उप-जातियों में बांटकर आंतरिक रूप से कमजोर कर देते हैं, जिससे ये अपनी मांगों के लिए एक मजबूत और संगठित दबाव समूह नहीं बन पाते।
सुधार का मार्ग इस स्थिति को बदलने के लिए सतत राजनीतिक चेतना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता सबसे ज़रूरी हैं। जब यह वर्ग तात्कालिक चुनावी वादों के बजाय दीर्घकालिक विकास, रोज़गार, और आत्मसम्मान को अपनी मुख्य मांग बनाएगा, तब राजनीतिक दलों के लिए केवल चुनावों के समय छलावा करना असंभव हो जाएगा।
— पूर्वी लहरे
