स्वयंभू भगवानों से सवाल
थोड़ा देकर ज्यादा छीन लेते हो,
कम रहता है उसे बहुत गिन देते हो,
संवैधानिक हक़ को अहसान बताते हो,
गाहे-बगाहे इसे हर मंच से सुनाते हो,
हे तथाकथित स्वयंभू भगवानों,
नागरिकों को बेवकूफ न जानो,
जो खून-पसीना बहाकर टैक्स चुकाता है,
वो दो वक़्त की रोटी को तरसाया जाता है,
तुम देकर चंद टुकड़े मुफ़्त की खैरात के,
दावा करते हो जैसे पाल रहे हो कायनात के,
अपनी ही जेब से हम लुटते आ रहे हैं,
और तुम हर चौराहे पर ढोल बजा रहे हो,
हक़ मांगें तो लाठियां और जेल मिलती है,
तुम्हारी चौसर की बिसात पर ज़िंदगी ढलती है,
अब आँखों से ये भरम का पर्दा हटेगा,
तुम्हारी झूठी रहमतों का ये खेल मिटेगा,
ये देश किसी की बपौती या जागीर नहीं,
जनता ही लिखेगी अब अपनी तक़दीर नई,
उतर जाओ कुर्सी के झूठे गुमान से,
बात करो अब अदब और संविधान से,
वक़्त बदलेगा,ये बात तुम मान लो,
ऐ हाकिमों आवाम को अब पहचान लो।
— राजेन्द्र लाहिरी
