क्षणिका
गांव का सुनसान प्लेटफार्म,
बरसती बूँदों की छांव,
पटरी पर धीमे-धीमे
गुजरती ट्रेन की थरथर ध्वनि।
आज फिर वही जगह
जहाँ तुम छोड़ गए थे,
और अब भी प्रतीक्षा में हूँ,
कि लौट आओगे कभी…।
— सविता सिंह मीरा
गांव का सुनसान प्लेटफार्म,
बरसती बूँदों की छांव,
पटरी पर धीमे-धीमे
गुजरती ट्रेन की थरथर ध्वनि।
आज फिर वही जगह
जहाँ तुम छोड़ गए थे,
और अब भी प्रतीक्षा में हूँ,
कि लौट आओगे कभी…।
— सविता सिंह मीरा