धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मनु और मनुस्मृति के विरोध का अर्थ है पशुवत आचरण

भारतवर्ष में यदा-कदा कुछ मानसिक विछिप्त प्रकार के आचरण वाले व्यक्ति, वामपंथी विचारक, सत्ता लोलुप लोग, राजनैतिक महत्वाकांक्षा को किसी भी प्रकार से प्राप्त करने वाले व्यक्ति मनु और मनुस्मृति तथा सनातन धर्म, संस्कृति का समाज में विरोध करते हैं। इनका उद्देश्य केवल और केवल समाज को आपस में लड़ाकर असभ्यता का रोपण कर अपना स्वार्थ पूरा करना होता है। इसके लिए यह किसी भी नीचता की हद पार कर सकते हैं। जबकि ये लोग यह भी जानते हैं कि हिन्दू धर्मग्रंथों की हमने मनमानी व्याख्या अपने हिसाब से किया है वास्तविक अर्थ और व्याख्या से इनका कोई लेना देना भी नहीं होता है। लेकिन फिर भी यह सनातन का विरोध करेंगे। अभी हाल ही में राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस सहित अखिलेश यादव भी मनु स्मृति की मनमाने ढंग से व्याख्य कर यह बता रहे हैं कि मनु स्मृति नारियों के विरोध में है। जबकि इनको यह नहीं पता कि मनु स्मृति का ही प्रसिद्ध श्लोक है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।। मनुस्मृति ३/५६ ।। अर्थात जहां स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती है, उनका सम्मान नही होता है वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं। अब यह विचार सनातन धर्म के अतिरिक्त किसी भी मत, मजहब में नहीं है। मनुस्मृति में ही यह भी कहा गया है कि माता प्रथम गुरु है, स्त्री का संरक्षण होना चाहिए, कन्याओं के पूजन का विधान मनुस्मृति देती है लेकिन राहुल गांधी की आंखों में नफरत का चश्मा लगा हुआ है इन्हें यह अच्छी बातें नहीं दिखाई देती। अब इन बुद्धिहंता लोगों को कौन समझाए कि जो आप मनु और मनुस्मृति का विरोध कर रहे हो इसका अर्थ है पशुवत आचरण करना क्योंकि हमारे सनातन धर्म के अनुसार श्रृष्टि का प्रथम पुरुष मनु को कहा गया है और मनु की संतानों को मनुष्य नाम दिया गया यदि मनु का विरोध करना है तो पहले अपने को मनुष्य कहलाना बन्द करो और जंतु कहलवाओं। मनु महाराज ने ही भारत की कालगणना को प्रतिपादित किया है जिसके अनुसार प्रहर, दिन, रात, तिथि, पक्ष, माह, वार, अयन, वर्ष, कल्प, युग, मन्वन्तर, नक्षत्र, पर्व और त्योहारों का निर्धारण होता है यदि मनु स्मृति को नहीं मानना है तो हिन्दुओं में होने वाले त्योहारों को न मनाएं। मनु महाराज ने ही मनुस्मृति में मनुष्यों के लिए आचरण और दिनचर्या की व्यवस्था बनाई है जिसके अनुसार सूर्योदय से पूर्व उठना, शौच जाना, साबुन/मिट्टी से हांथ धुलना, स्वच्छ रहना, स्नान करना, भक्ष्य – अभक्ष्य खाद्य पदार्थ को ध्यान में रखकर भोजन करना इत्यादि अब यदि मनु का विरोध करना है तो शौच के बाद अंग विशेष को न धुलें, स्नान न करें, प्रातः न जागें, जो मन आए कच्चा पक्का मांस खाएं पशुओं जैसा आचरण में प्रवत्त हों। मनु महाराज ने वैदिक विवाह की व्यवस्था मनुस्मृति में दिया है कि वर और वधु का ब्याह होने पर वधू अपने पति के घर सोलह श्रृंगार से सज्जित हो विदा होकर जाएगी। पत्नी पति के घर रहते हुए गृहस्थ धर्म के आचरण एवं मर्यादाओं का पालन करते हुए अपने अभीष्ट को प्राप्त करेगी। अब यदि मनुस्मृति को नहीं मानना है तो शादी के बाद पत्नी को अपने घर क्यों लाते हो यदि पितृसत्तात्मक सोच और मनुस्मृति से बाहर निकलना है तो ब्याह कर पति विदा होकर पत्नी के घर जाकर बसे। यही काम यदि राजीव गांधी किए होते कि सोनिया गांधी से ब्याह करने पर सोनिया के घर इटली विदा होकर जाते तो आज राहुल गांधी जैसा मन्द बुद्धि बालक भारत को न मिलता। मनु स्मृति में ही मनु महाराज ने कहा कि जिस स्त्री के उदर और पुरुष के वीर्य से जो संतान जन्म लेती है उसके वह माता – पिता होते हैं और उन दंपत्ति की सभी संताने आपस में भाई और बहन हैं इनके बीच के पारस्परिक संबंध और मर्यादाओं को भी परिभाषित किया गया है। यदि जो लोग मनुस्मृति को नहीं मानते हैं उन्हें चाहिए कि पत्नी को माता बना लें, बहन को पत्नी बना लें पिता को पुत्र कहें आदि आदि यही पशु व्यवहार है। मनुस्मृति सनातन धर्म का सत्य में प्रवत्त कराने वाला शास्त्र है इसके विपरीत व्यवहार पशुवत व्यवहार कहा जाता है। जिस प्रकार से पशु स्वतंत्र है मनमाने ढंग से कामाचार करे उसी प्रकार से मनु स्मृति के विरोधियों को भी करना चाहिए क्योंकि मनुस्मृति ने हम सनातनियों के लिए एक सामाजिक व्यवस्था प्रदान की है जिसके अनुसार ही हमारा व्यवहार होगा। मनुस्मृति में ही न्याय, राजव्यवस्था, करणीय- करणीय, ब्रह्मचर्य , गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास की मर्यादाओं और आचरण को निरूपित किया गया है। ईश उपासना, संध्या, देश काल परिस्थित के अनुसार करणीय कार्य का नीतियों का वर्णन भी मनुस्मृति में किया गया है। अब कुछ लोग कहते हैं कि भारत संविधान के अनुसार चलेगा मनुस्मृति के अनुसार नहीं तो यह सही बात है कि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था है और इसे संविधान के अनुसार ही चलना भी चाहिए हम संविधान में निर्देशित बातों को स्वीकार भी करते हैं किंतु संविधान कभी स्थाई नहीं है वह परिवर्तनीय है 26 जनवरी 1950 में संविधान लागू हुआ तबसे लेकर आजतक मूल संविधान में 106 संशोधन हो चुके हैं। किन्तु मनुस्मृति शाश्वत है, सनातन है उसमें कोई संशोधन नहीं हो सकता मनुस्मृति में बताई गई व्यवस्था के विपरीत व्यवहार पशुता की ओर ले जाता है सभ्यता की ओर नहीं। सनातन का अर्थ ही यही होता है कि सर्व काल में यथावत रहना, सतत् बने रहना और नित्य नवीन भी रहना यही सनातन है। सनातन प्राचीन भी है और नवीन भी। अतः भारत के सभी सभ्य मनुष्यों से आवाह्न है कि राहुल गांधी जैसी विचारधारा केवल पशुता को जन्म देगी, भारतीय परिवार व्यवस्था को तोड़ने का उपक्रम ही राहुल गांधी जैसी निकृष्ट मानसिकता है उसे समाज में न पनपने दें। मनुस्मृति में किसी भी समुदाय के लिए भेद-भाव का स्थान नहीं है अस्पृश्यता की कोई बात नहीं है, ऊंच नीच की कोई बात नहीं है बशर्ते मनमानी व्याख्या करने से बचना चाहिए परम्परा प्राप्त आचार्य से मिलकर शंका समाधान करेंगे तो सब सत्य ध्यान में आएगा। किसी के बहकावे में आकर विरोध नहीं होना चाहिए तर्क होना चाहिए। तर्क से समाधान है परिस्कार है।

— बाल भास्कर मिश्र

*बाल भास्कर मिश्र

पता- बाल भाष्कर मिश्र "भारत" ग्राम व पोस्ट- कल्यानमल , जिला - हरदोई पिन- 241304 मो. 7860455047