धरती माँ की पुकार
धरती माँ आज बहुत उदास है,
सूनी उसकी हर एक साँस है।
कहीं कटते वन, कहीं सूखी धार,
सुनो मनुष्य! उसकी करुण पुकार।
जिस आँचल में जीवन पलता था,
हर मौसम हँसकर खिलता था।
वही आँचल अब फटा हुआ है,
हर सपना जैसे बिखरा हुआ है।
नदियाँ रोती हैं चुपके-चुपके,
पहाड़ खड़े हैं सहमे-सहमे।
पक्षी ढूँढ़ें अपना आशियाना,
कहाँ मिलेगा उनको ठिकाना?
धुआँ निगल रहा नीला अम्बर,
जलता जाता है वन का अंतर।
लोभ की आग में अंधा इंसान,
भूल गया धरती का सम्मान।
धरती माँ फिर भी मौन खड़ी है,
ममता उसकी आज भी बड़ी है।
हर मौसम में देती उपहार,
फिर भी सहती रहती प्रहार।
आओ मिलकर प्रण यह लें,
हर आँगन में पौधे रोपें।
जल, जंगल और भूमि बचाएँ,
जीवन के सच्चे गीत सुनाएँ।
धरती माँ फिर मुस्काएगी,
हरियाली फिर लौट आएगी।
जब प्रेम से उसको अपनाएँगे,
तभी भविष्य सुरक्षित पाएँगे।
— डॉ. मुल्ला आदम अली
