कंठ रुँधा है
कंठ रुँधा है नयनद्वय, बहा रहे हैं नीर।
मन के भीतर दर्द है, कौन समझता पीर॥
आँखों में सावन बसा, अधरों पर है मौन।
दर्द छिपाए घूमता, मन को जाने कौन॥
याद तुम्हारी रात-दिन, करती मन बेहाल।
नींद हुई है दूर अब, आँखें हुईं निहाल॥
टूटे मन के तार जब, निकले दर्द अपार।
शब्द सभी चुप हो गए, रोया मन हर बार॥
आँसू बनकर बह गया, मन में जो संताप।
हँसने का अभिनय किया, भीतर गहरा ताप॥
चुप अधरों की बात को, बोल रहे हैं नैन।
दर्द हृदय का कह रहे, आँसू बनकर चैन॥
जिसको अपना मानकर, सौंप दिया था प्राण।
वही छोड़कर चल दिया, सूना हुआ जहान॥
बीती यादों के महल, ढहते पल-पल आज।
मन के सूने आँगना, कौन सजाए साज॥
दर्द पुराना फिर उठा, छूकर मन का तार।
सूखे नयनों में तभी, उमड़ा जल अपार॥
रात हुई तो याद ने, फिर घेरा मन-मीत।
तकिए पर आँसू गिरे, मौन हुआ संगीत॥
मन की पीड़ा को पढ़े, कौन समझता भाव।
चेहरे पर मुस्कान है, भीतर गहरे घाव॥
उम्मीदों के दीप सब, बुझते जाते आज।
अँधियारे मन में नहीं, दिखता कहीं प्रकाश॥
विरह-वेदना की अगन, जला रही है प्राण।
दूर खड़े हैं आप फिर, पास रहे अरमान॥
नयन नीर से भर गए, अधर रहे खामोश।
मन की पीड़ा कह गई, आँसू बनकर रोष॥
दर्द भले ही मौन हो, आँखें रही गवाह।
जिसको दिल ने खो दिया, उसकी रहती चाह॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
