शिक्षा एवं व्यवसाय

उच्च शिक्षा के सामने खड़ा सबसे कठिन प्रश्न

भारत के सर्वोच्च और सर्वाधिक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में गिने जाने वाले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई में 18 सितंबर 2026 को घटी एक अत्यंत हृदयविदारक घटना ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। इस दिन संस्थान के द्वितीय वर्ष के एक अत्यंत मेधावी छात्र साहिल वाकोडे ने अपने छात्रावास के कक्ष में आत्महत्या कर ली। इस युवा विद्यार्थी पर उसी दिन मध्यावधि परीक्षा के दौरान अनधिकृत रूप से संचार यंत्र का उपयोग करने का आरोप लगा था। किसी भी होनहार छात्र का इस प्रकार अपने जीवन को समाप्त कर लेना केवल एक परिवार की व्यक्तिगत क्षति नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण शैक्षणिक व्यवस्था, समाज और राष्ट्र की एक बहुत बड़ी सामूहिक विफलता है। देश के इन उत्कृष्ट संस्थानों में प्रवेश पाने वाले छात्र अत्यंत प्रतिभाशाली होते हैं, लेकिन यह घटना इस कठोर सत्य को उजागर करती है कि बौद्धिक प्रतिभा सदैव मानसिक दृढ़ता की परिचायक नहीं होती।

घटना के उपरांत छात्र के शोकाकुल परिवार ने अत्यंत गंभीर आरोप लगाए और आरक्षी थाने में औपचारिक रूप से अपनी शिकायत दर्ज कराई। परिवार का स्पष्ट दावा था कि उनके पुत्र को लंबे समय से संस्थान के भीतर जातिगत भेदभाव और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा था। इसी शिकायत को मुख्य आधार बनाते हुए प्रशासन ने संस्थान के एक प्राध्यापक सूर्यनारायण दूल्ला सहित कुछ अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध आत्महत्या के लिए उकसाने तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज की। कानूनी दृष्टिकोण से यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम माना गया है, परंतु नागरिक समाज को यह भी समझना होगा कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध केवल प्राथमिकी दर्ज होना उसे तत्काल प्रभाव से दोषी सिद्ध नहीं कर देता है। न्याय व्यवस्था का यह मूलभूत सिद्धांत है कि आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्णय केवल एक निष्पक्ष जांच और उचित न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही हो सकता है। जब तक न्यायालय किसी को अपराधी घोषित न कर दे, तब तक उसे निर्दोष मानने की परंपरा लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक अनिवार्य अंग है।

इस दुखद घटना के बाद भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के परिसर में छात्रों का व्यापक असंतोष फूट पड़ा और एक बड़ा आंदोलन प्रारंभ हो गया। छात्रों के भीतर पनप रही निराशा सड़कों पर आ गई और उन्होंने प्रशासन के सामने अपना 18 सूत्रीय मांगपत्र प्रस्तुत किया। इस मांगपत्र में घटना की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने, छात्र कल्याण व्यवस्था में आमूलचूल सुधार करने, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करने तथा इस पूरी घटना के लिए संस्थागत उत्तरदायित्व तय करने जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण मांगें शामिल थीं। छात्रों के इस भारी दबाव और निरंतर विरोध प्रदर्शन के बाद संस्थान प्रशासन को पीछे हटना पड़ा और उन्होंने अपने पूर्व में जारी किए गए आधिकारिक वक्तव्य पर खेद व्यक्त किया। संस्थान ने यह स्वीकार किया कि जांच पूरी होने से पहले घटना की परिस्थितियों पर किसी भी प्रकार की सार्वजनिक टिप्पणी करना अनुचित था। इसके साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए कि किसी भी प्रकार से निष्पक्ष जांच प्रभावित न हो, प्राध्यापक सूर्यनारायण दूल्ला को उनके सभी प्रशासनिक दायित्वों से तत्काल प्रभाव से मुक्त कर दिया गया।

यहीं से इस पूरे प्रकरण ने एक नया और विचारणीय मोड़ लिया। सूचना क्रांति के वर्तमान युग में जहां सूचनाओं का प्रसार अत्यधिक तीव्र गति से होता है, वहीं भ्रामक और असत्य सूचनाएं उससे भी अधिक गति से फैलती हैं। सामाजिक माध्यमों पर एक दूसरा ही कथानक बड़ी तेजी से आकार लेने लगा। अनेक अपुष्ट संदेशों ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि प्राध्यापक दूल्ला को प्रशासन ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है और कुछ विशेष संगठनों ने एक सोची समझी साजिश के तहत उनकी सामाजिक और पेशेवर प्रतिष्ठा को नष्ट कर दिया है। जबकि वास्तविकता यह थी कि विश्वसनीय समाचार स्रोत इन दावों की तनिक भी पुष्टि नहीं कर रहे थे। आधिकारिक जानकारी केवल इतनी थी कि उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज हुई है और जांच जारी है। इसी भ्रामक सूचना अभियान के अंतर्गत एक और दावा बहुत तेजी से प्रसारित हुआ जिसमें कहा गया कि संस्थान के निदेशक प्राध्यापक शिरीष केदारे ने छात्रों के भारी दबाव के आगे घुटने टेकते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए संस्थान को आधिकारिक रूप से सामने आकर इस समाचार का कड़ाई से खंडन करना पड़ा। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि निदेशक के त्यागपत्र की खबर पूरी तरह से असत्य और निराधार है। यह विशिष्ट उदाहरण हमें चेतावनी देता है कि संकट और संवेदनशीलता की परिस्थितियों में अपुष्ट सूचनाएं कितनी तेजी से जनमत को भ्रमित कर सकती हैं।

इस पूरे प्रकरण का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भी समाज के सामने आया जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। संस्थान के अनेक शिक्षकों ने एकजुट होकर एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया और प्राध्यापक दूल्ला के समर्थन में अपनी आवाज उठाई। शिक्षकों का स्पष्ट रूप से यह कहना था कि परीक्षा निरीक्षक के रूप में प्राध्यापक ने केवल संस्थान की स्वीकृत और निर्धारित शैक्षणिक प्रक्रिया का ही पालन किया था। उनका तर्क था कि परीक्षा कक्ष में अनुशासन बनाए रखना और किसी भी अनुचित साधन के प्रयोग को रोकना एक शिक्षक का प्राथमिक कर्तव्य है। शिक्षकों के इस समूह ने मांग की कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी शिक्षक की सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाना घोर अन्याय है।

यदि हम इस घटना का गहराई से विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल एक व्यक्ति या एक संस्थान तक सीमित बहस नहीं है। यह हमारे देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में लगातार बढ़ते जा रहे अमानवीय मानसिक दबाव, अत्यधिक प्रतियोगी वातावरण और छात्रों तथा प्रशासन के बीच बढ़ती संवादहीनता की एक बहुत ही भयानक कहानी है। देश के इन सर्वोच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए विद्यार्थी वर्षों तक कठोर परिश्रम करते हैं। लेकिन जब वे इन परिसरों में प्रवेश करते हैं तो उन्हें एक अलग ही प्रकार के दबाव का सामना करना पड़ता है। परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन का दबाव, असफलता का गहरा भय, सामाजिक पहचान से जुड़े संघर्ष, आर्थिक विषमताएं और भविष्य की अनिश्चितता मिलकर कई बार छात्र के मस्तिष्क पर ऐसा भारी बोझ बना देते हैं जिसे समय रहते कोई भी पहचान नहीं पाता है। यही कारण है कि छात्र कल्याण व्यवस्था को केवल एक कमरे में चलने वाले औपचारिक परामर्श केंद्र तक सीमित रखने का विचार अब पूरी तरह से विफल हो चुका है।

उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों के माता पिता की भी इस पूरी व्यवस्था में एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब कोई विद्यार्थी इतने बड़े संस्थान में प्रवेश प्राप्त करता है, तो उसके साथ पूरे परिवार की आकांक्षाएं जुड़ जाती हैं। यह सामाजिक और पारिवारिक अपेक्षाओं का भार विद्यार्थी के कंधों पर अदृश्य रूप से हमेशा बना रहता है। जब विद्यार्थी किसी अकादमिक समस्या या व्यक्तिगत संकट का सामना करता है, तो वह यह सोचकर अपने परिवार से बात नहीं कर पाता कि इससे उन्हें घोर निराशा होगी। संवाद की यह कमी कई बार इतनी गहरी हो जाती है कि छात्र अकेलापन महसूस करने लगता है। इसलिए शैक्षणिक संस्थानों का यह दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वे छात्रों के साथ एक ऐसा आत्मीय संबंध स्थापित करें जहां विद्यार्थी बिना किसी भय या संकोच के अपनी चिंताओं को साझा कर सके।

लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण शक्ति यह होती है कि वह भावनाओं के ज्वार में बहने के बजाय ठोस प्रमाणों और तथ्यों पर विश्वास करता है। किसी भी छात्र की असामयिक मृत्यु पर उसके पीड़ित परिवार को पूर्ण न्याय मिलना ही चाहिए। किसी भी आरोपित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने के लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र सुनवाई मिलनी ही चाहिए, और किसी भी शैक्षणिक संस्थान को पूरी पारदर्शिता के साथ अपनी संस्थागत जिम्मेदारी निभानी चाहिए। यदि इन तीनों स्तंभों में से किसी एक की भी उपेक्षा की जाती है, तो संपूर्ण न्याय प्रक्रिया अधूरी और विकलांग हो जाती है। अंततः वास्तविक न्याय का अर्थ केवल किसी दोषी को दंड देना मात्र नहीं होता है, बल्कि एक निर्दोष व्यक्ति के सम्मान की रक्षा करना भी न्याय का ही एक अभिन्न अंग है। पुलिस की जांच पूर्णतः स्वतंत्र होनी चाहिए और समाज को धैर्यपूर्वक सत्य के सामने आने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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