मेरी खामोशी में हजार सवाल हैं
कभी-कभी मुझे लगता है अगर मन के अंदर चल रही बातें कोई देख पाता, तो शायद मेरी खामोशी उसे खामोशी लगती ही नहीं।बाहर से में बिल्कुल सामान्य होती हूं। लोगों से बात करती हूँ, हँसती हूँ, अपने काम करती हूँ, अपने हिस्से की जिम्मेदारियां निभाती हूँ। कभी-कभी बिल्कुल वैसे ही जैसे कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन अंदर… शायद एक पूरा शहर बसा हुआ है। जहाँ हर बात पर एक सवाल है। और हर जवाब मिलने के बाद भी मन कहता है – पक्का? हूँ सही में? हाँ मैं बहुत सोचती हूँ। लोग इसे ओवरथिंकिंग कहते हैं। शायद ठीक ही कहते हैं। लेकिन क्या मैं सच में ऐसी थी? जब अपने बचपन को याद करती हूँ तो मुझे अंदर की वह लड़की बिल्कुल अलग दिखाई देती है।मनमौजी, बेफिक्र। जिसे दुनिया के हिसाब किताब से कोई मतलब नहीं था। जो मन में आया, कह दिया। जो अच्छा लगा, कर लिया। जिससे अपनापन लगा, उससे जुड़ गई। तब कहाँ पता था कि बड़े होकर लोग सिर्फ आपकी बातें नहीं सुनेंगे, वे आपकी कमजोरी भी तलाशेंगे। सुनेंगे, वे आपकी कमजोरी भी तलाशेंगे। तब कहाँ पता था जिस भावुकता को आप अपने होने का सबसे खूबसूरत हिस्सा समझते हैं।वही किसी दिन किसी के लिए आपका कमजोर पक्ष बन जायेगा। मैंने रिश्ते हमेशा बहुत मन से निभाये हैं, शायद जरूरत से ज्यादा मन से। किसी को अपना मान लिया तो फिर उसके लिए जगह बनाते समय मैंने कभी यह नहीं सोचा कि वह मेरे लिए उतनी जगह बनाएगा या नहीं। किसी की परेशानी अपनी लगती थी। किसी का दुःख अपना लगता था। किसी की चुप्पी परेशान करती थी। और शायद इसी लिए जब कुछ रिश्ते बदले, जब कुछ लोग बदले, जब चीजें मेरे हाथ से निकलती चली गई, तो मेरे अंदर भी कुछ बदल गया। पहले मुझे लोगों के जाने से दुःख होता था। अब लोगों के जाने का डर लगने लगा। पहले से पहले ही उनके जाने का डर लगने लगा। पहले किसी के व्यवहार में बदलाव बाद में समझ आता था। अब थोड़ा सा बदलाव भी मुझे बेचैन कर देता है। पहले मैं पूछती थी – क्या हुआ? अब मैं पूछने से पहले ही सौ बातें सोच लेती हूँ – क्या हुआ होगा? क्या मैंने कुछ गलत किया है। क्या वह मुझसे नाराज है? क्या किया? क्या वह मुझसे नाराज है? क्या अब सब पहले जैसा नहीं रहेगा। और कई बार सामने वाला कहता है – कुछ नहीं हुआ। बार सामने वाला कहता है – कुछ नहीं हुआ। लेकिन मेरा मन मानता नहीं। यही तो मेरी परेशानी है। मैं सिर्फ सामने शायद बातों की कही हुई बात नही सुनती हूँ। मैं उसकी आवाज का उतार-चढ़ाव भी सुनती हूँ। उसके शब्दों के बीच की चुप्पी भी सुनती हूँ।उसके व्यवहार में आया छोटा सा बदलाव भी महसूस करती हूँ और फिर वही सब मेरे दिल-दिमाग में घूमता रहता है। शायद भावुक होना यही है। आप सिर्फ शब्द नहीं सुनते हैं, आप उसके पीछे छिपी कई भावनाएं भी महसूस करने लगते हैं। लेकिन जब बार-बार उसी वजह से चोट मिले तो इंसान महसूस करना कम नहीं करता। बस हर चीज को लेकर सावधान हो जाता है और मेरी सावधानी भी शायद मेरी ओवरथिंकिंग बन गयी। अब कोई फैसला लेना हो तो मैं बहुत सोचती हूँ। कभी-कभी इतना कि फैसला लेने के बारे में सोचते में वक्त निकल जाता है। और फिर जिन लोगों को मैं अपने सबसे करीब मानती हूँ उनसे पूछती हूँ – तुम्हे क्या लगता है? मैं सही कर रही हूँ, मुझे यह करना चाहिए? कई बार सामने वाला शायद सोचता होगा कि मैं खुद फैसला क्यों नहीं लेती।ले सकती हूं,लेती भी हूँ।लेकिन कभी-कभी मन को अपने फैसले पर भरोसा करने के लिए किसी अपने की आवाज चाहिये होती है। ये कमजोरी नहीं है मेरी। यह सिर्फ मन का सहारा मांगना है। लेकिन हाँ, मैं यह भी मानती हूँ कि हर बार किसी से पूछते-पूछते अपने मन की आवाज कहीं पीछे छूट जाती है। और अब मैं उसे फिर सुनना सीख रही हूँ। क्योंकि आखिरकार जिंदगी मेरी है। दर्द मुझे महसूस होना है। फैसले मुझे लेने हैं और उन फैसलों के बाद जो भी होगा, उसे संभालना भी मुझे ही है। इसलिए जब कोई बहुत आसानी से कह देता है – छोड़ो जो हुआ देखो आगे। तो मेरे मन में एक ही सवाल आता है – किसके भरोसे? किसके भरोसे छोड़ दूँ? जब करना धरना सब मुझे ही है, मुझे ही संभालना है तो मैं बिना सोचे कैसे छोड़ दूँ? लेकिन फिर एक आवाज आती है। वो आवाज मेरे बाबा मेरे महाकाल की है। मेरे लिए महाकाल सिर्फ मंदिर में विराजे भगवान नहीं है, वह मेरे पिता जैसे लगते हैं मुझे। ऐसे पिता जिनके सामने आकर मुझे हर बात समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। जिसके सामने दुःख बोलूँ या ना बोलूँ, मन हल्का हो जाता है। कभी-कभी लगता है मैं दुनिया के सामने कितनी भी मजबूत बनने की कोशिश कर लूँ, लेकिन बाबा के सामने बस एक बच्ची रह जाती हूँ।वही बच्ची जिसे भरोसा है कि बाबा संभाल लेंगे। इसलिए जब जिंदगी बहुत उलझ जाती है, तो मेरी सारी सोच आखिर आकर उन्हीं के पास रुकती है। मैं उनसे यह नहीं कहती कि बाबा, मेरे लिए सब कुछ मेरी इच्छा के मुताबिक कर देना। मैं बस कहती हूँ – बाबा मुझे सही समझ देना। सही रास्ता दिखाना और जहाँ मेरी समझ कम पड़ जाए वहाँ मेरा हाथ पकड़ लेना। मेरे लिए मेरे महाकाल पर भरोसा करने का मतलब यह कभी नहीं रहा कि मैं बिना सोचे समझे सब कुछ करूँ। मैं सोचती हूँ, अपनी तरफ से अपनी पूरी समझ से सोचूँगी। अपनी तरफ से पूरी कोशिश भी करूँगी। लेकिन जहाँ मेरी पूरी कोशिश खत्म हो जाएगी, वहाँ मेरा भरोसा शुरू होगा। शायद यही मेरी आस्था है।यहीं मेरी सब से बड़ी ताकत भी। क्योंकि कई बार में मेरी सबसे बड़ी ताकत भी। क्योंकि कई बार में खुद को भी नहीं समझ पाती।इतना कुछ मन में चलता रहता है कि समझ नहीं आता किस बात पर रोउ और किस बात को जाने दूँ।कभी-कभी सब कुछ ठीक नहीं होता और कभी-कभी बहुत मन ठीक नहीं होता, फिर भी मैं मुस्कुरा देती हूँ। लोग कहते हैं, तुम बहुत मजबूत हो। मैं मुस्करा देती हूँ क्योंकि उन्हें क्या बताऊँ कि मजबूत होने में और मजबूत दिखने में कितना फर्क होता है। कितनी रातें ऐसी होती जब बाहर सब शांत होता है लेकिन दिल दिमाग शांत नहीं होता। कितनी बार किसी छोटी सी बात को सोचते-सोचते पुरानी बात याद आ जाती है। कितनी बार खुद से कहती हूँ – बस अब नहीं सोचना और अगले ही पल वही दिमाग पूछता है – लेकिन अगर? यही ‘अगर’ मेरी सबसे बड़ी परेशानी है। अगर ऐसा हो गया तो? अगर वैसा हो गया तो? अगर मैंने गलत फैसला लिया तो? अगर सामने वाला बदल गया तो? अगर मैंने फिर भरोसा किया और फिर चोट लगी तो? इन सारे ‘अगर’ के बीच में कई बार आज का दिन कहीं खो जाता है। और शायद अब मुझे यही बदलना है। ओवरथिंकिंग को पूरी तरह खत्म नहीं करना। क्योंकि शायद मैं कभी वह इंसान बन ही नहीं सकती जो बिना सोचे कुछ भी कर दे। लेकिन मुझे इतना जरूर सीखना है हर डर को सच मान लेना जरूरी नहीं। हर संभावना हकीकत नहीं होनी जरूरी नहीं। हर चुप्पी नाराजगी नहीं होती। हर दूरी बिछड़ना नहीं होती और हर इंसान वह नहीं होता जिसने कभी मुझे चोट पहुँचाई थी। नहीं होता जिसने कभी मुझे चोट पहुँचाई थी। शायद मुझे लोगों को उनकी जगह से देखना सीखना है, अपने पुराने अनुभवों की नजर से नहीं। शायद मुझे खुद पर भी थोड़ा भरोसा करना है। यह भरोसा कि अगर कल कुछ हुआ तो मैं उसे संभाल लूँगी। गलत भी हुआ तो मैं उसे संभाल लूँगी।मैंने पहले भी संभाला है शायद उस वक्त भी मुझे लगा था कि मैं नहीं संभाल पाऊँगी, लेकिन संभाल लिया। यही बात मुझे खुद को बार-बार याद दिलानी है कि हर आने वाली परेशानी से पहले ही डरना जरूरी नहीं। कुछ परेशानियाँ आएंगी ही नहीं। कुछ सवालों के जवाब समय देगा। कुछ रिश्तों को सच्चाई वक्त बताएगा और कुछ चीजें बस अपने महाकाल के भरोसे छोड़नी होगी। क्योंकि शायद हर चीज को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़कर रखना ही जिंदगी नहीं है। कभी-कभी ढीली पकड़नी पड़ती है। जो अपना है, वह अपने हिस्से की जगह लेकर रहेगा और जो नहीं है उसे कितना भी पकड़कर रखना चाहो, वह एक दिन हाथ से निकल ही जाएगा। यह बात समझना आसान नहीं है। ये बात खासकर मेरे जैसे इस इंसान के लिए, जो हर बात को दिल से लगाती है। लेकिन फिर भी सीखना होगा। थोड़ा कम सोचना होगा, थोड़ा कम उम्मीद करना, थोड़ा कम दूसरे पर सोचना, थोड़ा ज्यादा भरोसा करना। दूसरों पर भी और सबसे ज्यादा खुद पर। क्योंकि मैं सिर्फ वह लड़की नहीं हूँ जिसे लोगों ने उसकी भावुकता के लिए कमजोर समझा। मैं वह लड़की हूँ जिसने उसी भावुकता के साथ बहुत कुछ सहा है। बहुत कुछ संभाला है। बहुत कुछ खोया है और फिर भी अपने अंदर प्यार बचाकर रखा है। शायद यह मेरी कमजोरी नहीं, मेरी खूबसूरती है। हाँ मैं ओवरथिंकर हूँ। मैं आज भी बहुत सोचती हूँ। मेरी खामोशी में आज भी हजारों सवाल है। लेकिन अब इन सवालों के बीच एक जवाब भी धीरे-धीरे जगह बना रहा है – हर बात का जवाब मुझे खुद नहीं ढूँढना है। कुछ जवाब वक्त देगा, कुछ जिंदगी देगी और कुछ खुद मेरे महाकाल। इसलिए अब मन जब बहुत ज्यादा सोचने लगेगा, तब मैं खुद से कहूँगी – बस अब थोड़ा रुक। जो करना था कर लिया, जो कहना था कह दिया, जहाँ तक कोशिश करना थी कर ली। अब बाकी बाबा पर छोड़ दे। और शायद उस पल मेरी खामोशी में चल रहे हजारों सवालों के बीच कहीं दूर से एक छोटा सा जवाब आएगा – मैं हूँ ना। और शायद इतना जवाब मेरे लिए इतना ही काफी है।
— अवन्तिका सिंह
