कविता
चल उड़ जा रे
ओ ख्वाबों के परिंदे
ये तेरा सुंदर जहाँ नहीं
अश्कों को छिपाकर भी
ओढ़नी पड़े झूठी मुस्कराहट
दर्द को सहकर भी यहाँ
चलती रहती है कायनात भी
कराहट की बालकनी में
कहकहे लगते हों जहां हर पल
वाजिब नहीं वहाँ तेरा रुक पाना
चल उड़ जा रे
ओ सपनों के सौदागर
सन्नाटों की बस्ती में अब
तेरी किसी को जरूरत नहीं
ख्वाब देखने छोड़ दिये हैं
अब प्रेम के बाजीगरों ने भी
सस्ती हो गई है यहाँ जान
और महंगे हुए हैं उसूल भी
कौन भर पाएगा महँगाई में
तेरे प्यार की लंबी किस्तें
चल उड़ जा रे
ओ ख्वाबों के परिंदे
अश्कों की सूखी लकीरों में
अब भोर की वो लालिमा कहाँ
— वर्षा वार्ष्णेय
