धोते अपने पाप
गलती अपनी मानना, लगता भारी पाप।
शनि-मंगल पर डालकर, धोते अपने पाप।।
कर्मों में जब छेद हों, ग्रह बन जाएँ ढाल।
कुँडली लेकर घूमते, खुद का बिगड़ा हाल।।
आलस सिंहासनों, भाग्य बने दरबार।
मेहनत को ठेंगा दिखा, ढूँढते चमत्कार।।
खुद बोया काँटों भरा, किस्मत को दें दोष।
अपनी करनी भूलकर, किये ग्रहों आक्रोश।।
नाकामी का ठीकरा, शनि-मंगल के माथ।
मेहनत को छुट्टी मिली, भाग्य बना फिर साथ।।
कर्म किए बिन माँगते, किस्मत का उपहार।
ऐसे लोगों की कुंडली, क्या बदले संसार।।
ग्रह बेचारे क्या करें, जब कर्म हुए बेकार।
आलस गठरी ढो रहे, फिर भी माँगे प्यार।।
हार गए तो भाग्य है, जीत मिले तो ज्ञान।
अपनी मेहनत भूलकर, कैसा यह अभिमान।।
शनि-मंगल को कोसते, बैठे जो आराम।
खुद कर्मों की फाइलें, सारी हैं बदनाम।।
भाग्य बदलने हैं चले, कर्म रहे बेकार।
ज्योतिषियों से पूछते, खुद से नहीं सवाल।।
दोष सितारों पर मढ़े, खुद को समझें पाक।
कर्मों की जब बारियों, खुद की कटती नाक।।
कुंडली में रहे ढूँढ़ते, जीवन का हर दोष।
कर्म किताबें खोलते, उड़ जाएँ सब होश।।
मेहनत आधी भी नहीं, सपने पूरे चाह।
किस्मत को फिर कोसते, कैसी उलटी राह।।
अपनी गलती छिप गई, लिए ग्रहों की आड़।
आलस स्वयम् पहन लिया, ज्योतिष चढ़े पहाड़।।
कर्मों में कंगालिया, किस्मत पर अधिकार।
ऐसे दावेदार को, कौन करे स्वीकार।।
खुद ही नाव डुबो दिए, दोष नदी के नाम।
कर्मों की यह चाल है, खूब रहे बदनाम।।
हार मिली तो कुंडली, जीत मिली तो ध्येय।
ऐसे स्वार्थी आदमी, किस्मत से ले श्रेय।।
ग्रह-नक्षत्रों क्या कहे, जब न बदले चाल।
पहले अपनी सोच फिर, बदल ग्रहों का हाल।।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
