कविता

सच्चा भारत

दलित, पिछड़े और सवर्ण
हम सबको पास बुलाते हैं,
हैं सभी नागरिक इस देश के,
सबको गले लगाते हैं,
इंसानियत ही धर्म है अपना,
पीड़ा महसूसना मर्म है अपना,
ईद,दीवाली और क्रिसमस
मिलकर हम मनाते हैं,
कर देते हैं सबको ताकीद,
हक़ और अधिकार से सब हों वाकिफ़,
छल-कपट कर लोगों को
हरिजन नहीं बनाते हैं,
तोड़ कुरीति की जंजीरें,
हम नया दौर अब लाएंगे,
जात-पात के ठेकेदारों को
आईना रोज दिखलाएंगे,
संविधान की शपथ उठाकर,
हर आंचल को खुशहाल करें,
मजहब से ऊपर उठकर हम,
इंसान गले से लगाएंगे,
नफरत की जो आंधी उठी,
उसे मोहब्बत से मोड़ेंगे,
टूटे हुए जो दिल हैं उनको,
भाईचारे से जोड़ेंगे,
अनेकता में एकता ही,
इस पावन धरा की शक्ति है,
तिरंगे की इस शान की खातिर,
खुद का सर्वस्व निचोड़ेंगे।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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