राजनीति

विकास के आंकड़े और रोजगार का सच

भारत की अर्थव्यवस्था के तेज विस्तार की चर्चा आज राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। सड़कों का जाल बढ़ रहा है, नए औद्योगिक गलियारे आकार ले रहे हैं, डिजिटल सेवाओं का विस्तार हो रहा है, विनिर्माण को गति देने की कोशिशें तेज हुई हैं और वैश्विक निवेश के लिए भारत को आकर्षक गंतव्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इन उपलब्धियों के बीच एक सवाल लगातार अपनी गंभीरता बनाए हुए है—क्या आर्थिक विकास की यह रफ्तार पर्याप्त संख्या में सम्मानजनक और स्थायी रोजगार भी पैदा कर रही है? विकास की असली कसौटी केवल उत्पादन और निवेश के बढ़ते आंकड़े नहीं, बल्कि यह भी है कि उस विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक किस रूप में पहुंच रहा है। यदि अर्थव्यवस्था आगे बढ़े लेकिन युवाओं के हाथों में काम न हो, तो विकास की चमक के पीछे एक गहरी बेचैनी छिपी रह सकती है।

भारत की सबसे बड़ी शक्तियों में उसकी विशाल युवा आबादी शामिल है। यही युवा जनसंख्या देश के लिए जनसांख्यिकीय अवसर बन सकती है और यही अवसर उचित रोजगार के अभाव में चुनौती भी बन सकता है। हर वर्ष बड़ी संख्या में युवा शिक्षा पूरी करके श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं। उनकी आकांक्षाएं पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हैं। वे केवल किसी भी काम की तलाश में नहीं हैं, बल्कि स्थिर आय, सामाजिक सुरक्षा, सम्मानजनक कार्य-परिस्थितियों और आगे बढ़ने के अवसर की अपेक्षा रखते हैं। इसलिए रोजगार का प्रश्न केवल बेरोजगारी की दर से नहीं समझा जा सकता। यह रोजगार की गुणवत्ता, आय, उत्पादकता, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है।

भारत में आर्थिक वृद्धि और रोजगार के बीच संबंध हमेशा सीधा नहीं रहा है। तकनीकी परिवर्तन, स्वचालन और पूंजी-प्रधान उत्पादन ने उत्पादन बढ़ाने की क्षमता तो बढ़ाई है, लेकिन प्रत्येक क्षेत्र में उसी अनुपात में श्रम की मांग पैदा हो, यह आवश्यक नहीं। एक आधुनिक कारखाना पहले की तुलना में अधिक उत्पादन कर सकता है, परंतु उसके लिए अपेक्षाकृत कम श्रमिकों की आवश्यकता हो सकती है। डिजिटल अर्थव्यवस्था भी नई नौकरियां पैदा करती है, लेकिन उनमें प्रवेश के लिए विशिष्ट कौशल की जरूरत होती है। ऐसे में समस्या केवल रोजगार पैदा करने की नहीं, बल्कि ऐसे रोजगार पैदा करने की है जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय युवाओं को समायोजित किया जा सके।

यहीं से भारत के विकास मॉडल के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है। देश को उच्च उत्पादकता वाली आधुनिक अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना है, लेकिन साथ ही बड़ी संख्या में श्रमिकों को उत्पादक रोजगार भी देना है। कृषि से बाहर आने वाली आबादी के लिए विनिर्माण, निर्माण, पर्यटन, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, खुदरा और विभिन्न सेवा क्षेत्रों में पर्याप्त अवसर पैदा करने होंगे। केवल कुछ अत्यधिक कुशल लोगों के लिए उच्च आय वाले रोजगार और दूसरी ओर बड़ी संख्या में कम आय वाले असंगठित कामगारों का विस्तार एक संतुलित रोजगार संरचना नहीं बना सकता।

विनिर्माण इस चुनौती का एक महत्वपूर्ण उत्तर हो सकता है। भारत लंबे समय से विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाने और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी भूमिका मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा, वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, वाहन, रक्षा उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में संभावनाएं मौजूद हैं। लेकिन निवेश आकर्षित करना ही पर्याप्त नहीं होगा। छोटे और मध्यम उद्यमों को मजबूत करना, उत्पादन लागत को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना, बिजली और परिवहन की विश्वसनीय उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा श्रमिकों को उद्योग की जरूरत के अनुरूप प्रशिक्षण देना भी उतना ही आवश्यक है। बड़े उद्योगों की सफलता तभी व्यापक रोजगार प्रभाव पैदा करेगी जब उनके आसपास स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं और सहायक उद्यमों का मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हो।

रोजगार की समस्या का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष कौशल है। शिक्षा और रोजगार के बीच का अंतर आज भी बड़ी चुनौती है। डिग्री प्राप्त कर लेना और रोजगार योग्य होना एक ही बात नहीं है। उद्योगों को जिन कौशलों की आवश्यकता है, वे तेजी से बदल रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, रोबोटिक्स, आंकड़ा विश्लेषण, साइबर सुरक्षा और डिजिटल सेवाओं ने काम की प्रकृति बदलनी शुरू कर दी है। ऐसे में कौशल प्रशिक्षण को केवल प्रमाणपत्र वितरण की प्रक्रिया बनाना गंभीर भूल होगी। प्रशिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच वास्तविक साझेदारी विकसित करनी होगी, ताकि युवाओं को वही कौशल मिले जिनकी बाजार में वास्तविक मांग है।

इसके साथ ही हमें रोजगार के आंकड़ों के पीछे छिपी वास्तविकता को भी समझना होगा। कोई व्यक्ति काम कर रहा है, इसका अर्थ यह नहीं कि उसे पर्याप्त आय और सुरक्षित भविष्य मिल रहा है। असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग आजीविका के लिए काम करते हैं, लेकिन उनकी आय अस्थिर हो सकती है और सामाजिक सुरक्षा सीमित। स्वरोजगार भी कई बार अवसर से अधिक मजबूरी का परिणाम होता है। इसलिए रोजगार नीति का लक्ष्य केवल अधिक लोगों को किसी न किसी आर्थिक गतिविधि में शामिल करना नहीं, बल्कि उत्पादक और सम्मानजनक रोजगार का विस्तार करना होना चाहिए।

महिलाओं की रोजगार भागीदारी इस पूरी तस्वीर का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। भारत की आर्थिक क्षमता का एक बड़ा हिस्सा तब तक पूरी तरह सामने नहीं आ सकता, जब तक महिलाओं के लिए सुरक्षित, सुलभ और सम्मानजनक रोजगार के अवसर व्यापक नहीं होते। कार्यस्थल की सुरक्षा, आवागमन, बच्चों की देखभाल, लचीले कार्य विकल्प और समान अवसर जैसे प्रश्न रोजगार नीति के हाशिये पर नहीं, बल्कि उसके केंद्र में होने चाहिए। महिला श्रम की भागीदारी में वृद्धि परिवार की आय बढ़ाने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता को भी मजबूत कर सकती है।

ग्रामीण भारत के लिए रोजगार की चुनौती का स्वरूप अलग है। कृषि पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता है, लेकिन इसका अर्थ कृषि को कमजोर करना नहीं होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, ग्रामीण पर्यटन, हस्तशिल्प, स्थानीय विनिर्माण और डिजिटल सेवाओं को बढ़ावा देकर रोजगार के नए केंद्र विकसित किए जा सकते हैं। यदि रोजगार के अवसर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में ही पैदा हों तो महानगरों की ओर होने वाला मजबूरन पलायन भी कम किया जा सकता है। विकास का अर्थ केवल महानगरों की ऊंची इमारतें नहीं, बल्कि छोटे शहरों में बढ़ती आर्थिक संभावनाएं भी होना चाहिए।

भारत को यह भी समझना होगा कि भविष्य के रोजगार केवल सरकारी नौकरियों से नहीं बनेंगे। सरकार की भूमिका प्रत्यक्ष नियोक्ता से अधिक ऐसा वातावरण तैयार करने की होनी चाहिए जिसमें निजी क्षेत्र, छोटे उद्यम, सहकारी संस्थाएं, सामाजिक उद्यम और स्वरोजगार नए अवसर पैदा कर सकें। व्यवसाय शुरू करने की प्रक्रिया सरल हो, छोटे उद्यमों को समय पर ऋण मिले, बाजार तक पहुंच आसान हो और नियामकीय अनिश्चितता कम हो, तो रोजगार सृजन का आधार व्यापक हो सकता है। उद्यमिता को केवल प्रेरक भाषणों का विषय नहीं, बल्कि वित्त, तकनीक, बाजार और मार्गदर्शन से जुड़ी वास्तविक व्यवस्था बनाना होगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को विकास और रोजगार के बीच चुनाव करने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता ऐसे विकास मॉडल की है जिसमें दोनों एक-दूसरे के पूरक बनें। बुनियादी ढांचा रोजगार को गति दे, उद्योग रोजगार की गुणवत्ता बढ़ाए, शिक्षा उत्पादकता को मजबूत करे, तकनीक नए अवसर पैदा करे और सामाजिक सुरक्षा श्रमिकों को परिवर्तन के दौर में सुरक्षा दे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन को रोजगार के शत्रु के रूप में देखने के बजाय ऐसी रणनीति विकसित करनी होगी जिसमें मशीनें उत्पादकता बढ़ाएं और मनुष्य नई तथा अधिक मूल्यवान भूमिकाओं में आगे बढ़ें।

आर्थिक विकास का सबसे सुंदर रूप वह है जिसमें आंकड़ों की वृद्धि लोगों के जीवन में दिखाई दे। जब किसी छोटे शहर का युवा अपने घर के पास सम्मानजनक नौकरी पा सके, जब ग्रामीण परिवार की आय केवल मौसम पर निर्भर न रहे, जब महिला अपनी प्रतिभा के अनुरूप आर्थिक अवसर हासिल कर सके और जब एक छोटा उद्यम स्थानीय स्तर पर कई परिवारों की आजीविका का आधार बन सके, तभी विकास की गति सामाजिक परिवर्तन की शक्ति बनती है। भारत के सामने आज चुनौती विकास की रफ्तार बनाए रखने के साथ उसे रोजगार-सघन, समावेशी और टिकाऊ बनाने की है। अर्थव्यवस्था का इंजन तेज चलना निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि उस इंजन से निकलने वाली ऊर्जा समाज के अधिकाधिक लोगों के जीवन को गति दे। विकास की अंतिम सफलता तब मानी जाएगी, जब राष्ट्रीय समृद्धि के आंकड़े और नागरिक की व्यक्तिगत समृद्धि के अनुभव के बीच की दूरी लगातार कम होती जाए।

— अवनीश कुमार गुप्ता

अवनीश कुमार गुप्ता

साहित्यकार, स्वतंत्र स्तंभकार, समीक्षक एवं पुस्तकालयाध्यक्ष पता: प्रयागराज 211008, उत्तर प्रदेश मोबाइल: 8354872602 ईमेल: awanishg30@gmail.com

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