डिजिटल इंडिया के दरवाजे पर रिश्वत की पुरानी दस्तक
कागज कंप्यूटर में पहुंच गया, व्यवस्था वहीं की वहीं है। जिस देश में सरकार मोबाइल पर सेवाएं देने का दावा करती है, वहां मृत परिजन की संपत्ति अपने नाम कराने के दौरान 58 प्रतिशत परिवारों को रिश्वत देनी पड़ी; इनमें 73 प्रतिशत ने प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन/भूमि कार्यालय को इसका प्रमुख केंद्र बताया। सवाल इसलिए केवल भ्रष्टाचार का नहीं, डिजिटल शासन की विश्वसनीयता का है। लोकलसर्किल्स का ताजा सर्वेक्षण डिजिटल इंडिया की चमक के पीछे की दरार दिखाता है। चार साल पहले रिश्वत देने वाले परिवारों का आंकड़ा 52 प्रतिशत था। यानी कंप्यूटर, पोर्टल और ऑनलाइन रिकॉर्ड आए, पर रिश्वत घटने के बजाय बढ़ी। डिजिटल सुधार की असली कसौटी स्क्रीन पर दिखता रिकॉर्ड नहीं, नागरिक का बिना घूस अपना अधिकार हासिल करना है।
विडंबना यही है कि सरकार ने कागजों को डिजिटल कर दिया, प्रक्रिया को नहीं। रिकॉर्ड ऑफ राइट्स का कंप्यूटरीकरण लगभग पूरा है, सब-रजिस्ट्रार कार्यालय ऑनलाइन हो रहे हैं और भू-आधार जैसी योजनाओं से भूमि रिकॉर्ड आधुनिक बनाने की कोशिश जारी है। दिल्ली जैसे शहरों में एआई आधारित सत्यापन और ब्लॉकचेन तक की चर्चा है। फिर भी जमीन पर संपत्ति ट्रांसफर के लिए व्यक्तिगत उपस्थिति, भौतिक दस्तावेज, अंगूठे के निशान और अधिकारी की मंजूरी जैसी बाधाएं कायम हैं। तकनीक ने फाइल को स्क्रीन तक पहुंचा दिया, लेकिन उसे रोकने की ताकत अब भी उसी मेज पर है। डिजिटल व्यवस्था ने सुविधा का आवरण जरूर बदला है, मगर पुराने विवेकाधिकार को खत्म नहीं किया।
मृत्यु के बाद संपत्ति अपने नाम कराने की प्रक्रिया परिवार के दुख को प्रशासनिक यातना में बदल देती है। एक ओर अपने व्यक्ति को खोने का आघात, दूसरी ओर प्रमाणपत्र, दस्तावेज, आपत्तियां और दफ्तरों के चक्कर। ऐसे में “काम जल्दी चाहिए तो कुछ व्यवस्था करनी होगी” जैसा संकेत भी परिवार को समझौते पर मजबूर करता है। सर्वेक्षण में केवल 32 प्रतिशत परिवारों ने बिना बड़ी परेशानी के प्रक्रिया पूरी की; 58 प्रतिशत को कहीं न कहीं रिश्वत देनी पड़ी, जबकि कुछ ने प्रक्रिया शुरू ही नहीं की या वह लंबी खिंचती रही। यह देरी सिर्फ फाइल की नहीं, परिवार की आर्थिक सुरक्षा की भी है। बैंकों में करीब 78 हजार करोड़ और बीमा कंपनियों में लगभग 14 हजार करोड़ रुपये का दावा न किया गया धन इसी जटिलता और देरी की आर्थिक कीमत दिखाता है।
भूमि रिकॉर्ड की कमजोरी भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी दरार है। कई राज्यों में कैडस्ट्रल मानचित्रों का डिजिटलीकरण अधूरा है। रजिस्ट्रेशन और म्यूटेशन अलग-अलग चलते हैं—एक जगह रजिस्ट्री हो जाती है, दूसरी जगह नाम दर्ज होने में समय लगता है। पुराने सर्वेक्षण, वास्तविक कब्जे और सरकारी रिकॉर्ड का अंतर विवाद पैदा करता है। जब मूल रिकॉर्ड ही अद्यतन और एकरूप न हो, तो अधिकारी के विवेक की गुंजाइश बढ़ती है और वहीं रिश्वत के रास्ते खुलते हैं। डिजिटल रिकॉर्ड ने सूचना तो सुलभ की है, लेकिन जवाबदेही की ऐसी मजबूत कड़ी नहीं बनाई, जो नागरिक को तय समय में, बिना अतिरिक्त भुगतान, अपना काम होने का भरोसा दे सके।
पंजीकरण कार्यालय इस भ्रष्ट तंत्र का सबसे बड़ा पड़ाव बनकर सामने आते हैं। सर्वेक्षण में 73 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने इन्हीं कार्यालयों को रिश्वत का प्रमुख केंद्र बताया। कुछ परिवारों ने केवल यहीं भुगतान किया, तो कुछ को अदालतों और दूसरे सरकारी दफ्तरों में भी पैसा देना पड़ा। प्रक्रिया जितनी पेचीदा, दलाल उतना जरूरी। सामान्य नागरिक को न दस्तावेजों की पूरी जानकारी होती है, न आपत्तियों की वैधता और न प्रक्रिया के अगले चरण का स्पष्ट पता। इसी अंधेरे में बिचौलियों का कारोबार फलता है। रिश्वत से इनकार करने वाले परिवारों का काम महीनों, कभी वर्षों तक अटक सकता है। यानी रिश्वत सिर्फ पैसा नहीं वसूलती, नागरिक से उसका समय भी छीनती है।
डिजिटल भारत की असली परीक्षा पोर्टल पर नहीं, उस आखिरी सरकारी मेज पर होती है जहां नागरिक का काम अटकता है। पोर्टल पर आवेदन कर देना पारदर्शिता नहीं, अगर उसे आगे बढ़ाने के लिए नागरिक को फिर दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें। ऑनलाइन रिकॉर्ड भी जवाबदेही नहीं, अगर गलती सुधारने का रास्ता अस्पष्ट हो। एआई और ब्लॉकचेन का नाम भी बेअसर है, अगर अंतिम फैसला ऐसी प्रक्रिया में अटका रहे जिसकी देरी का कारण नागरिक को पता ही न चले। तकनीक तभी भ्रष्टाचार घटाती है, जब वह अनावश्यक मानवीय संपर्क घटाए, नियम स्पष्ट करे और हर कदम की जिम्मेदारी तय करे। वरना भ्रष्टाचार भी तकनीक के साथ अपना चेहरा बदल लेता है।
अब सुधार का रास्ता नई तकनीक जोड़ने में नहीं, पुरानी प्रक्रिया की गांठ खोलने में है। रजिस्ट्रेशन और म्यूटेशन को एकीकृत कर ऐसा तंत्र बने, जिसमें वैध रजिस्ट्री के बाद भूमि रिकॉर्ड में नामांतरण स्वतः या न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप से हो। भौतिक उपस्थिति अपवाद हो, नियम नहीं। हर आवेदन की तय समय-सीमा हो और नागरिक डिजिटल ट्रैकिंग से देख सके कि फाइल कहां अटकी है और जिम्मेदार कौन है। शिकायत निवारण केवल ऑनलाइन आवेदन तक सीमित न रहे; समय-सीमा और जवाबदेही भी तय हो। भूमि मानचित्र, स्वामित्व रिकॉर्ड और वास्तविक कब्जे के बीच विसंगतियां दूर करना भी जरूरी है; वरना खराब मूल रिकॉर्ड पर खड़ी डिजिटल व्यवस्था पुरानी समस्या को सिर्फ नई स्क्रीन देगी।
जमीन का मालिकाना हक सरकारी कृपा नहीं, नागरिक का वैधानिक अधिकार है। यदि मृत परिजन की संपत्ति उत्तराधिकारियों के नाम कराने के लिए रिश्वत देनी पड़े, तो दोष केवल भ्रष्ट कर्मचारी का नहीं, उस व्यवस्था का है जिसने अधिकार और उसके क्रियान्वयन के बीच दलाली की जगह छोड़ दी है। डिजिटल भारत की असली परीक्षा स्क्रीन पर नहीं, सरकारी मेज पर होगी। जिस दिन विरासत दर्ज कराने आए परिवार से कोई यह नहीं कहेगा—“काम तो हो जाएगा, लेकिन व्यवस्था करनी पड़ेगी”, उसी दिन डिजिटल सुधार सचमुच नागरिक तक पहुंचेगा। वरना पोर्टल बदलते रहेंगे, रिकॉर्ड ऑनलाइन होते रहेंगे और तकनीक आगे बढ़ती रहेगी—लेकिन नागरिक का हक अब भी उसी पुरानी मेज के पीछे बैठा इंतजार करता रहेगा।
— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
