नहरों की छत पर सौर क्रांति
भारत की ऊर्जा आवश्यकता निरंतर बढ़ रही है और इसके साथ स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण की चुनौती भी गंभीर होती जा रही है। सौर ऊर्जा के विस्तार के लिए अब प्रश्न केवल इतना नहीं रह गया है कि अधिक बिजली कैसे पैदा की जाए, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण हो गया है कि उसके लिए भूमि कहाँ से आए। बढ़ती जनसंख्या, कृषि भूमि पर दबाव और तेजी से फैलते आधारभूत ढाँचे के बीच बड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए भूमि की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुकी है। ऐसे समय में भारत का विशाल नहर तंत्र एक ऐसे संसाधन के रूप में सामने आ रहा है, जिसका उपयोग अब तक मुख्यतः सिंचाई और जलापूर्ति के लिए किया जाता रहा है। नहरों के ऊपर सौर पटल स्थापित करके विद्युत उत्पादन की अवधारणा जल और ऊर्जा—दोनों आवश्यकताओं को एक साथ साधने की संभावना प्रस्तुत करती है।
नहर-शीर्ष सौर ऊर्जा का आशय ऐसी व्यवस्था से है, जिसमें नहरों के ऊपर ऊँची संरचनाओं पर सौर पटल लगाए जाते हैं। इन संरचनाओं का निर्माण नहर की चौड़ाई, दिशा, गहराई, जलप्रवाह और भौगोलिक बनावट को ध्यान में रखकर किया जाता है, ताकि पानी के प्रवाह में किसी प्रकार की बाधा न आए। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि विद्युत उत्पादन के लिए अलग से विशाल भूभाग की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम हो जाती है। जिस भूमि और जल संरचना का उपयोग पहले से सिंचाई के लिए हो रहा है, उसी के ऊपर ऊर्जा उत्पादन की दूसरी परत तैयार की जा सकती है।
पंजाब में बीस मेगावाट क्षमता वाली नहर-शीर्ष सौर परियोजनाओं के संदर्भ में किए गए आकलन से संकेत मिलता है कि लगभग सौ एकड़ भूमि की बचत संभव हुई है। यह केवल भूमि बचाने का उदाहरण नहीं है, बल्कि ऊर्जा नियोजन की बदलती सोच का संकेत भी है। यदि सड़क, नहर, जलाशय और अन्य सार्वजनिक आधारभूत संरचनाओं का बहुउद्देश्यीय उपयोग किया जाए, तो ऊर्जा विस्तार और भूमि संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।
नहर-शीर्ष सौर ऊर्जा का दूसरा महत्वपूर्ण लाभ जल संरक्षण से जुड़ा है। खुले जल की सतह पर सूर्य की गर्मी और हवा के कारण बड़ी मात्रा में पानी वाष्पित होता है। नहर के ऊपर सौर पटल लगाए जाने से पानी का एक हिस्सा सीधे सूर्य के संपर्क से बच जाता है। जल-संकट वाले क्षेत्रों में यह लाभ विशेष महत्व रखता है। इस प्रकार एक ही संरचना से दो उपयोग सामने आते हैं—ऊपर से विद्युत उत्पादन और नीचे जल संरक्षण। भारत जैसे देश में, जहाँ ऊर्जा सुरक्षा के साथ जल सुरक्षा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, यह दोहरा लाभ दूरगामी महत्व रखता है।
सौर पटल के नीचे बहता पानी उनके आसपास के तापमान को कुछ हद तक नियंत्रित करने में भी सहायक हो सकता है। अत्यधिक तापमान सौर पटल की विद्युत उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। जल की निकटता और वायु संचरण की परिस्थितियाँ कुछ स्थानों पर उनके तापीय व्यवहार को बेहतर बना सकती हैं। हालांकि इसका लाभ प्रत्येक स्थान पर समान नहीं होगा। इसलिए किसी भी नहर को केवल उसके आकार या लंबाई के आधार पर सौर ऊर्जा के लिए उपयुक्त मानना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
भारत में नहर-आधारित सौर ऊर्जा की संभावनाएँ केवल कुछ सीमित परियोजनाओं तक नहीं हैं। विभिन्न आकलनों में नहर-शीर्ष तथा नहर-किनारे सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए लगभग एक सौ इकतीस गीगावाट तक की संभावित क्षमता का उल्लेख किया गया है। उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में विस्तृत नहर तंत्र इस संभावना को विशेष महत्व देता है। लेकिन संभावित क्षमता और वास्तविक उपयोग योग्य क्षमता के बीच अंतर समझना आवश्यक है। नहर की लंबाई अधिक होने मात्र से वह सौर परियोजना के लिए आर्थिक रूप से उपयुक्त नहीं हो जाती। सूर्य का प्रकाश, नहर की दिशा, चौड़ाई, संरचनात्मक मजबूती, आसपास की विद्युत आवश्यकता तथा विद्युत वितरण व्यवस्था से दूरी जैसे अनेक तत्व किसी परियोजना की व्यवहार्यता निर्धारित करेंगे।
यहीं से इस व्यवस्था की वास्तविक चुनौतियाँ सामने आती हैं। जमीन पर स्थापित सामान्य सौर संयंत्रों की तुलना में नहर के ऊपर सौर पटल लगाने के लिए मजबूत और ऊँची संरचनाओं की आवश्यकता होती है। इन संरचनाओं के लिए अतिरिक्त इस्पात, आधार, सुरक्षा व्यवस्था और निर्माण कार्य की जरूरत पड़ती है। परिणामस्वरूप प्रारंभिक लागत बढ़ सकती है। यदि आर्थिक व्यवहार्यता का पर्याप्त अध्ययन किए बिना परियोजनाओं को केवल पर्यावरणीय लाभ के आधार पर आगे बढ़ाया गया, तो उनसे अपेक्षित परिणाम प्राप्त करना कठिन होगा।
रखरखाव भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। नहर के ऊपर स्थापित सौर पटल की सफाई, निरीक्षण और मरम्मत सामान्य भूमि-आधारित संयंत्रों की तुलना में अधिक कठिन हो सकती है। धूल, पक्षियों की गतिविधि, वर्षा, तेज हवा और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण नियमित देखभाल आवश्यक होगी। दूसरी ओर नहर स्वयं एक सक्रिय जल संरचना है। इसलिए किसी भी मरम्मत कार्य को जलप्रवाह और सिंचाई व्यवस्था को प्रभावित किए बिना पूरा करना होगा। ऊर्जा परियोजना और सिंचाई तंत्र के बीच समन्वय यहाँ तकनीकी आवश्यकता के साथ प्रशासनिक आवश्यकता भी बन जाता है।
विद्युत वितरण व्यवस्था से जुड़ाव भी महत्वपूर्ण प्रश्न है। नहरें प्रायः लंबी और रैखिक संरचनाएँ होती हैं तथा अनेक स्थानों से होकर गुजरती हैं। लेकिन प्रत्येक स्थान पर पर्याप्त विद्युत उपकेंद्र या विद्युत संचरण क्षमता उपलब्ध हो, यह आवश्यक नहीं है। यदि किसी परियोजना से उत्पन्न बिजली को दूर स्थित विद्युत तंत्र तक पहुँचाने के लिए नई संचरण व्यवस्था बनानी पड़े, तो कुल लागत बढ़ सकती है। इसलिए केवल पर्याप्त सूर्यप्रकाश को आधार बनाकर स्थान चयन करना पर्याप्त नहीं होगा। ऊर्जा उत्पादन और विद्युत आवश्यकता के बीच भौगोलिक संबंध को भी प्राथमिकता देनी होगी।
भारत को इस क्षेत्र में स्पष्ट और एकरूप नीति की आवश्यकता है। नहर-शीर्ष सौर परियोजनाओं के लिए मानकीकृत तकनीकी मानदंड तैयार किए जा सकते हैं। इनमें संरचना की ऊँचाई, भार सहन क्षमता, जलप्रवाह, सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा, सफाई, मरम्मत और आपदा प्रबंधन के स्पष्ट प्रावधान होने चाहिए। राज्य सिंचाई विभागों, विद्युत वितरण संस्थाओं, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़े विभागों तथा निजी निवेशकों के बीच बेहतर समन्वय के लिए एक स्पष्ट संस्थागत व्यवस्था भी आवश्यक होगी।
वित्तीय सहायता इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। प्रारंभिक लागत अधिक होने की स्थिति में कम ब्याज वाले ऋण, व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण और लक्षित आर्थिक सहायता से परियोजनाओं को गति दी जा सकती है। लेकिन सहायता का आधार केवल स्थापित विद्युत क्षमता नहीं होना चाहिए। वास्तविक विद्युत उत्पादन, बचाई गई भूमि, जल संरक्षण, रखरखाव लागत और दीर्घकालीन आर्थिक व्यवहार्यता जैसे मानकों को भी मूल्यांकन में शामिल करना चाहिए। इससे परियोजनाएँ केवल कागजी उपलब्धि न रहकर टिकाऊ ऊर्जा परिसंपत्ति बन सकेंगी।
नहर-शीर्ष सौर ऊर्जा को पारंपरिक सौर ऊर्जा का विकल्प नहीं, बल्कि उसका पूरक समझना अधिक उचित होगा। जहाँ भूमि उपलब्ध है और भूमि-आधारित सौर संयंत्र आर्थिक रूप से अधिक व्यवहार्य हैं, वहाँ सामान्य सौर परियोजनाएँ उपयोगी रहेंगी। वहीं ऐसे क्षेत्रों में जहाँ भूमि पर कृषि, आवास या अन्य विकास गतिविधियों का दबाव अधिक है, नहर आधारित सौर ऊर्जा अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
इसके लिए परियोजनाओं का चयन वैज्ञानिक आधार पर होना चाहिए। प्रत्येक संभावित नहर का जलप्रवाह, सूर्यप्रकाश, संरचनात्मक स्थिति, भूमि की बचत, जल वाष्पीकरण में संभावित कमी, विद्युत मांग, विद्युत वितरण की उपलब्धता और निर्माण लागत का संयुक्त अध्ययन किया जाना चाहिए। इससे यह तय किया जा सकेगा कि कहाँ नहर के ऊपर सौर पटल लगाना वास्तव में लाभकारी है और कहाँ अन्य विकल्प बेहतर रहेंगे।
भारत की ऊर्जा यात्रा अब केवल अधिक बिजली पैदा करने की यात्रा नहीं है। यह सीमित संसाधनों के अधिक विवेकपूर्ण और बहुउद्देश्यीय उपयोग की यात्रा भी है। नहर के ऊपर फैले सौर पटल इस बदलती सोच के प्रतीक बन सकते हैं—नीचे पानी अपनी राह चलता रहे और ऊपर सूर्य का प्रकाश विद्युत में बदलता रहे। यदि तकनीक, अर्थव्यवस्था, जल संरक्षण और पर्यावरणीय विवेक के बीच संतुलन स्थापित किया गया, तो नहरें केवल खेतों तक पानी पहुँचाने वाली जलधाराएँ नहीं रहेंगीं; वे भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य की नई आधाररेखा भी बन सकती हैं।
वास्तविक सफलता इस बात में होगी कि भारत अपनी मौजूदा संरचनाओं को केवल उनके पारंपरिक उपयोग तक सीमित न रखे, बल्कि उनमें छिपी अतिरिक्त संभावनाओं को पहचाने। नहर के ऊपर सौर पटल इसी सोच का उदाहरण हैं—एक ही स्थान, दो महत्वपूर्ण आवश्यकताएँ और संसाधनों का अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग। जल बचे, भूमि बचे और स्वच्छ विद्युत बढ़े, तो यही समन्वय भारत की ऊर्जा नीति को अधिक टिकाऊ और दूरदर्शी दिशा दे सकता है।
— अवनीश कुमार गुप्ता
