पितरों का तर्पण और वृद्धाश्रम : हमारी संस्कृति का सबसे बड़ा विरोधाभास
भारतीय संस्कृति की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में यदि किसी एक तत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया जाए, तो वह है—माता-पिता, पूर्वजों और पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और उत्तरदायित्व की भावना। जिस देश में पितृपक्ष के दिनों में लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं, उनके लिए तर्पण और श्राद्ध करते हैं, जहाँ “मातृदेवो भव” और “पितृदेवो भव” जैसी अवधारणाएँ केवल धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों की आधारशिला मानी जाती रही हैं, उसी देश में वृद्धाश्रमों की आवश्यकता हमारे सामाजिक जीवन के सामने एक अत्यंत गंभीर प्रश्न खड़ा करती है—आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि जिन माता-पिता ने अपनी संतान के बचपन को सुरक्षित किया, उसकी शिक्षा और संस्कार के लिए अपने जीवन की सुविधाएँ त्यागीं और उसके भविष्य के निर्माण में अपना वर्तमान लगा दिया, उन्हीं माता-पिता को जीवन की संध्या में अपने ही घर से दूर किसी वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़ रहा है? यह प्रश्न केवल वृद्धाश्रमों की संख्या का प्रश्न नहीं है; यह हमारे परिवार, हमारी संवेदनशीलता, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी बदलती सामाजिक चेतना का प्रश्न है। एक ओर हम पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं, उनके नाम पर अनुष्ठान करते हैं, जल अर्पित करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और पूर्वजों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं; दूसरी ओर यदि जीवित माता-पिता अकेलेपन, उपेक्षा, असुरक्षा और भावनात्मक अभाव से गुजर रहे हों, तो हमारी श्रद्धा का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है? मृत पूर्वजों के लिए तर्पण और जीवित माता-पिता के लिए उपेक्षा के बीच जो दूरी दिखाई देती है, वही हमारे समय का एक गहरा सामाजिक विरोधाभास है। परंपरा का मूल उद्देश्य मनुष्य को अपने संबंधों के प्रति संवेदनशील बनाना था, न कि केवल अनुष्ठानों तक सीमित रखना; इसलिए यदि हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक स्मृतियाँ हमें पितरों का सम्मान करना सिखाती हैं, तो वही संस्कृति जीवित माता-पिता की गरिमा, सुरक्षा और आत्मसम्मान की रक्षा करने का दायित्व भी हमारे सामने रखती है।
वृद्धाश्रम अपने आप में कोई बुरी संस्था नहीं हैं। अनेक परिस्थितियों में वे अकेले, निराश्रित, संतानविहीन अथवा विशेष चिकित्सा और देखभाल की आवश्यकता वाले वृद्धजनों के लिए आश्रय, सुरक्षा, चिकित्सा-सुविधा और सामाजिक साथ उपलब्ध करा सकते हैं। बदलती सामाजिक संरचना में ऐसे संस्थानों की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। समस्या वृद्धाश्रम के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है जिसमें परिवार कभी-कभी वृद्ध माता-पिता की जिम्मेदारी से स्वयं को मुक्त समझने लगता है। यदि कोई वृद्ध व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी सुरक्षित और सम्मानजनक आवासीय व्यवस्था का चुनाव करता है, तो उसे केवल परिवार-विरोधी घटना के रूप में देखना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि किसी माता-पिता को इसलिए वृद्धाश्रम जाना पड़े कि उनके अपने घर में उनके लिए समय नहीं है, उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है, उनकी उपस्थिति को बोझ समझा जाता है अथवा संपत्ति और आर्थिक हित रिश्तों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं, तो यह निश्चित रूप से चिंतन का विषय है। वृद्धावस्था जीवन का वह चरण है जिसमें व्यक्ति को सुरक्षा, सम्मान, अपनत्व और इस विश्वास की आवश्यकता होती है कि उसके जीवन का मूल्य अभी भी परिवार के लिए बना हुआ है। जिस व्यक्ति ने कभी अपने बच्चे को रात-रात भर गोद में लेकर उसकी बीमारी में जागकर समय बिताया था, उसी व्यक्ति को जब अपने जीवन के अंतिम वर्षों में कुछ समय, कुछ संवाद और थोड़े-से अपनत्व के लिए तरसना पड़े, तो यह केवल एक पारिवारिक समस्या नहीं रह जाती; यह सामाजिक संवेदना की परीक्षा बन जाती है।
भारतीय परिवार की पारंपरिक संरचना में वृद्धजन केवल घर में रहने वाले बुजुर्ग नहीं होते थे; वे परिवार की स्मृति, अनुभव और निर्णय-परंपरा के वाहक होते थे। दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों को केवल कहानियाँ नहीं सुनाते थे, बल्कि परिवार की वंश-स्मृति, लोकपरंपरा, नैतिक मूल्य और जीवन के अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुँचाते थे। संयुक्त परिवार की व्यवस्था में वृद्धावस्था को जीवन का निष्क्रिय चरण नहीं माना जाता था। व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्रिय न भी रहे, तब भी परिवार में उसकी भूमिका समाप्त नहीं होती थी। वह सलाह देता था, बच्चों को देखता था, पारिवारिक विवादों में मध्यस्थता करता था और अपने अनुभव से नई पीढ़ी को दिशा देता था। समय के साथ परिस्थितियाँ बदल गईं। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, रोजगार के बदलते अवसर, महानगरों की जीवनशैली, छोटे आवास, विदेशों और दूसरे राज्यों में रोजगार तथा पति-पत्नी दोनों के कार्यरत होने जैसी परिस्थितियों ने संयुक्त परिवार को कई स्थानों पर एकल परिवार में बदल दिया। यह परिवर्तन सामाजिक विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया भी हो सकता है और इसे केवल नैतिक पतन कह देना उचित नहीं होगा। किंतु इस परिवर्तन के साथ यदि पारिवारिक उत्तरदायित्व की भावना भी कमजोर हो जाए, तो समस्या उत्पन्न होती है। दूरी भौगोलिक हो सकती है, लेकिन यदि वह भावनात्मक दूरी में बदल जाए, तो वृद्ध माता-पिता के जीवन में अकेलापन प्रवेश कर जाता है।
आज के समय में यह समझना आवश्यक है कि वृद्ध माता-पिता की आवश्यकताएँ केवल आर्थिक नहीं होतीं। धन भेज देना, दवाइयाँ खरीद देना, चिकित्सा बीमा कराना या किसी अच्छे अस्पताल में इलाज करा देना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन मनुष्य केवल आर्थिक सुरक्षा से नहीं जीता। उसे भावनात्मक सुरक्षा भी चाहिए। वृद्ध माता-पिता अक्सर अपने बच्चों से बड़ी माँग नहीं करते। वे चाहते हैं कि बेटा कभी फोन करके पूछ ले कि तबीयत कैसी है; बेटी कुछ समय बैठकर उनकी पुरानी बातें सुन ले; पोते-पोतियाँ उनके पास आकर कुछ देर खेल लें; परिवार उनके अनुभव को बेकार न समझे; उनके निर्णयों का सम्मान किया जाए और उन्हें यह महसूस न कराया जाए कि वे अब परिवार के लिए अनावश्यक हैं। वृद्धावस्था में व्यक्ति का शरीर कमजोर हो सकता है, लेकिन उसकी भावनाएँ समाप्त नहीं होतीं। उसकी स्मृतियाँ जीवित रहती हैं, उसके सपने जीवित रहते हैं और सबसे बढ़कर उसका आत्मसम्मान जीवित रहता है। इसलिए वृद्ध व्यक्ति की देखभाल का अर्थ केवल उसके शरीर की देखभाल करना नहीं, बल्कि उसकी गरिमा की रक्षा करना भी है।
यहीं पितृपक्ष और तर्पण की परंपरा का अर्थ और अधिक गहरा हो जाता है। पितरों को जल अर्पित करने की परंपरा हमें यह स्मरण कराती है कि हमारा वर्तमान हमारे अतीत से जुड़ा हुआ है। कोई भी पीढ़ी अपने आप अस्तित्व में नहीं आती। हमारी भाषा, संस्कृति, परिवार, संस्कार, संपत्ति, शिक्षा और जीवन के अवसरों के पीछे पिछली पीढ़ियों का योगदान होता है। यदि हम अपने पूर्वजों को स्मरण करते हैं, तो वह स्मरण हमें कृतज्ञ बनाना चाहिए। कृतज्ञता केवल शब्दों या अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि व्यवहार में दिखाई देती है। यदि पिता ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा परिवार के लिए समर्पित किया और माँ ने अपने सुखों का त्याग करके बच्चों को बड़ा किया, तो उनके जीवन की संध्या में उनके प्रति संवेदना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का विषय नहीं हो सकती। पितृपक्ष हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि हमारे पूर्वज कौन थे; उसे यह प्रश्न भी हमारे सामने रखना चाहिए कि आज हमारे घर में जो वृद्ध माता-पिता हैं, उनके प्रति हमारा व्यवहार कैसा है। जिस हाथ ने हमारे बचपन में हमें भोजन कराया, उस हाथ में वृद्धावस्था में दवा रखना क्या हमारी पहली जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए? जिस व्यक्ति ने हमारी असफलताओं के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ा, उसके कमजोर पड़ जाने पर क्या हमारा साथ समाप्त हो जाना चाहिए?
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—तर्पण स्मृति का संस्कार है और सेवा जीवित कृतज्ञता का व्यवहार। दोनों का अपना स्थान है, लेकिन यदि स्मृति में श्रद्धा हो और व्यवहार में उपेक्षा, तो हमारे जीवन-मूल्यों के बीच एक गंभीर विसंगति पैदा होती है। हम अपने दिवंगत माता-पिता के चित्र पर माला चढ़ाते हैं, उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देते हैं और उनके नाम पर दान करते हैं; लेकिन यदि उनके जीवनकाल में हम उनके साथ बैठने के लिए समय नहीं निकाल सके, उनकी बीमारी में उनके पास नहीं रह सके, उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं की, तो हमें अपने भीतर झाँककर यह पूछना चाहिए कि हमारी श्रद्धा कहीं स्मृति तक सीमित तो नहीं हो गई है। मृत व्यक्ति को सम्मान देना सरल है, क्योंकि वह हमसे कोई प्रश्न नहीं पूछता, हमारी दिनचर्या में हस्तक्षेप नहीं करता और हमारी जीवनशैली से कोई असहमति व्यक्त नहीं करता। जीवित वृद्ध माता-पिता के साथ संबंध अधिक जटिल हो सकते हैं, क्योंकि उनके विचार, अपेक्षाएँ और अनुभव हमारे निर्णयों से टकरा सकते हैं। वास्तविक परीक्षा वहीं होती है—जहाँ प्रेम केवल स्मृति नहीं, बल्कि धैर्य और व्यवहार बनता है।
फिर भी इस पूरे प्रश्न को केवल नई पीढ़ी के दोष के रूप में देखना उचित नहीं होगा। परिवार एक द्विपक्षीय संस्था है। जैसे बच्चों की जिम्मेदारी है कि वे माता-पिता का सम्मान करें, वैसे ही माता-पिता की भी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों की स्वतंत्रता, निजी जीवन और बदलती परिस्थितियों को समझें। पीढ़ियों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं। पुरानी पीढ़ी सामूहिकता और पारिवारिक अनुशासन को अधिक महत्व दे सकती है, जबकि नई पीढ़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजी निर्णयों को अधिक महत्व देती है। विवाह, रोजगार, संपत्ति, जीवनशैली और बच्चों के पालन-पोषण को लेकर मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं। ऐसे मतभेदों का समाधान किसी एक पक्ष को दोषी ठहराकर नहीं, बल्कि संवाद, धैर्य और पारस्परिक सम्मान से किया जा सकता है। परिवार में वृद्धजन का सम्मान तभी स्थायी होगा जब सम्मान दोनों दिशाओं से सुरक्षित रखा जाए। माता-पिता यदि बच्चों की परिस्थितियों को समझें और बच्चे माता-पिता की भावनात्मक आवश्यकताओं को समझें, तो अनेक समस्याएँ बिना किसी कठोर निर्णय के हल हो सकती हैं।
संपत्ति का प्रश्न भी वृद्धावस्था और पारिवारिक संबंधों में महत्वपूर्ण है। कुछ परिवारों में वृद्ध माता-पिता की संपत्ति, मकान या आर्थिक संसाधन उनके जीवन के अंतिम वर्षों में रिश्तों का केंद्र बन जाते हैं। जहाँ माता-पिता को उनके व्यक्तित्व के बजाय उनकी संपत्ति के आधार पर देखा जाने लगे, वहाँ परिवार का भावनात्मक ढाँचा कमजोर पड़ने लगता है। माता-पिता की संपत्ति पर अधिकार का प्रश्न कानूनी हो सकता है, लेकिन माता-पिता के प्रति सम्मान का प्रश्न नैतिक है। संपत्ति का बँटवारा हो सकता है, घर अलग हो सकते हैं, आर्थिक व्यवस्थाएँ बदल सकती हैं; लेकिन इससे माता-पिता के प्रति कर्तव्य समाप्त नहीं होना चाहिए। संतान को यह समझना चाहिए कि माता-पिता केवल संपत्ति देने वाले व्यक्ति नहीं हैं; वे स्वयं में एक पूर्ण मानवीय अस्तित्व हैं, जिनके जीवन, अनुभव और भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
वृद्धाश्रमों के बढ़ते महत्व को देखते हुए समाज को दो समानांतर दिशाओं में काम करना होगा। पहली दिशा परिवार को मजबूत करने की होनी चाहिए और दूसरी दिशा उन वृद्धों के लिए सम्मानजनक संस्थागत व्यवस्था विकसित करने की, जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है। परिवारों को वृद्ध माता-पिता की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील बनाया जाना चाहिए। समाज में ऐसी संस्कृति विकसित होनी चाहिए जहाँ वृद्ध व्यक्ति स्वयं को बोझ न समझें और परिवार उन्हें बोझ समझने की मानसिकता से बचे। दूसरी ओर, जिन वृद्धों को वृद्धाश्रम की आवश्यकता है, उनके लिए ऐसी संस्थाएँ केवल चार दीवारों और भोजन की व्यवस्था तक सीमित नहीं होनी चाहिए। वहाँ स्वास्थ्य, मनोरंजन, पुस्तकालय, सांस्कृतिक गतिविधियाँ, सामाजिक संवाद, मानसिक सक्रियता, कानूनी सहायता और सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था होनी चाहिए। वृद्धाश्रम यदि किसी वृद्ध की विवशता है तो उसे गरिमापूर्ण बनाया जाना चाहिए; और यदि किसी वृद्ध की स्वेच्छा है तो उसे सम्मानित विकल्प के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि आज वृद्धावस्था स्वयं बदल रही है। आज के अनेक वृद्ध शिक्षित हैं, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, तकनीक से परिचित हैं और अपनी पसंद-नापसंद के बारे में स्पष्ट हैं। वे केवल किसी की दया के पात्र नहीं हैं। वे निर्णय लेने की क्षमता रखने वाले नागरिक हैं। इसलिए वृद्धों के प्रति दृष्टिकोण “देखभाल करने” से आगे बढ़कर “सम्मान के साथ साथ रहने” का होना चाहिए। उन्हें केवल इसलिए कमजोर न समझा जाए कि उनकी उम्र अधिक है। वृद्धावस्था अनुभव की संपदा भी है। एक परिवार जो अपने वृद्धजनों के अनुभव का सम्मान करता है, वह अपनी पीढ़ियों के बीच संवाद की एक मजबूत कड़ी बनाए रखता है।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि आज का युवा कल का वृद्ध है। जो बच्चा आज अपने माता-पिता को वृद्ध समझकर उनकी बातों को टाल रहा है, वह स्वयं एक दिन उसी अवस्था में पहुँचेगा। जीवन का चक्र निरंतर घूमता है। आज हम जिस पीढ़ी को वृद्ध कह रहे हैं, कल वही स्थान हमारा होगा। इसलिए वृद्धों के प्रति हमारा व्यवहार वास्तव में अपने भविष्य के प्रति हमारा व्यवहार है। यदि हम आज सम्मान, करुणा और जिम्मेदारी का वातावरण बनाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी उसी संस्कृति को आगे बढ़ाएँगी। यदि हम आज उपेक्षा को सामान्य बना देंगे, तो कल वही उपेक्षा हमारे सामने भी लौट सकती है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “वृद्धाश्रम क्यों हैं?” बल्कि प्रश्न होना चाहिए—“हम ऐसा समाज कैसे बनाएँ जहाँ वृद्धाश्रम आवश्यकता होने पर सम्मानजनक आश्रय तो हों, लेकिन किसी संवेदनशील माता-पिता की उपेक्षा का आसान विकल्प न बनें?” इस प्रश्न का उत्तर कानून से अधिक संस्कार में, उपदेश से अधिक व्यवहार में और कर्मकांड से अधिक संवेदना में छिपा है। हमें पितरों का तर्पण अवश्य करना चाहिए, अपनी परंपराओं का सम्मान अवश्य करना चाहिए और अपने पूर्वजों की स्मृतियों को जीवित रखना चाहिए; लेकिन उसी के साथ यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे घर के वृद्ध माता-पिता अपने जीवनकाल में ही प्रेम, सम्मान और अपनत्व का अनुभव करें। उनके लिए सबसे बड़ा तर्पण शायद किसी नदी के किनारे अर्पित किया गया जल नहीं, बल्कि उनके काँपते हाथ को थाम लेना है; सबसे बड़ा श्राद्ध शायद किसी भोज का आयोजन नहीं, बल्कि उनकी आँखों में सम्मान बनाए रखना है; सबसे बड़ी श्रद्धांजलि शायद उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाना नहीं, बल्कि उनके जीवित रहते हुए उन्हें यह विश्वास दिलाना है कि वे हमारे लिए बोझ नहीं, हमारी जड़ों का हिस्सा हैं।
अंततः पितरों की संस्कृति और वृद्धाश्रमों की आवश्यकता के बीच दिखाई देने वाला विरोधाभास हमें अपनी परंपरा को अस्वीकार करने के लिए नहीं, बल्कि उसके वास्तविक अर्थ को समझने के लिए प्रेरित करता है। परंपरा तभी जीवित रहती है जब वह व्यवहार में उतरती है। यदि हम पितरों को याद करते हैं, तो हमें अपने वर्तमान के वृद्धों को भी याद रखना होगा। यदि हम पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ हैं, तो उनके द्वारा दिए गए संस्कारों को अपने आचरण में जीवित रखना होगा। यदि हम तर्पण करते हैं, तो सेवा और संवेदना को भी अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा। वृद्धाश्रम तब सामाजिक विडंबना नहीं रहेंगे जब वे उन लोगों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक आश्रय बनें जिन्हें उनकी आवश्यकता है; और वे सामाजिक पीड़ा का प्रतीक तब बनते हैं जब कोई वृद्ध केवल इसलिए वहाँ पहुँचे कि उसके अपने घर में उसके लिए जगह तो थी, लेकिन समय नहीं; भोजन तो था, लेकिन अपनापन नहीं; छत तो थी, लेकिन सम्मान नहीं। भारतीय संस्कृति की वास्तविक शक्ति इसी में है कि वह हमें केवल अतीत को पूजना नहीं सिखाती, बल्कि वर्तमान में अपने कर्तव्य को पहचानने की प्रेरणा भी देती है। इसलिए पितरों को तर्पण करते समय यदि हम अपने जीवित माता-पिता की आँखों में प्रेम, विश्वास और सम्मान का प्रकाश देख सकें, तो शायद हमारी संस्कृति का सबसे सुंदर उद्देश्य पूरा हो जाएगा। पूर्वजों की स्मृति हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है, लेकिन जीवित माता-पिता की सेवा उन जड़ों को जीवन देती है। यही वह बिंदु है जहाँ परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष समाप्त होकर एक मानवीय संतुलन में बदल सकता है—जहाँ वृद्धाश्रम आवश्यकता की संस्था हो, उपेक्षा की मंजिल नहीं; जहाँ परिवार स्वतंत्रता का सम्मान करे, लेकिन जिम्मेदारी से विमुख न हो; और जहाँ पितरों का तर्पण केवल अतीत की श्रद्धा न होकर वर्तमान की संवेदना का भी प्रतीक बने।
— डॉ. अशोक
