कविता

बेटियों का डर

विधा- कविता
शीर्षक- बेटियों का डर

सर्व समर्थ हो बेटियों, डर-डर कर क्यों रहती हो,
पुरुषों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर चलती हो,
परीक्षाओं में पुरुषों से अधिक अच्छा परिणाम देती हो,
घर-बाहर कुशलता से काम कर लेती हो,
हर क्षेत्र में सफलता का झंडा गाड़ देती हो,
पुरुषों और महिलाओं के वेतन-सम्मान में भेदभाव के प्रति,
अपनी आवाज उठाओ,
चिंतन की ललकार सुनो,
निपुणता से अपने सपनों को बुनो,
चिंतन करो, दो जवाब सुनकर चिंतन की ललकार,
छीन लो अपने जायज अधिकार!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

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