कविता

संवैधानिक हुंकार

संवैधानिक चाबुक को पीठ पर उनके
इस तरह से फिराओ,
तड़ित बिजली से कम झटका न लगे
ऐसा महसूस कराओ,
आये दिन करते रहते हैं
बरसाती मेंढकों की तरह टर्र टर्र
सूख जाए उनके आस का दरिया
त्वरित उनको भान कराओ,
यह देश नहीं किसी की बपौती है,
हर वंचित के हक की यहां चुनौती है,
जो दबाना चाहते हैं सदियों की आवाज़ को,
अब बदलना होगा उस दकियानूसी समाज को,
आरक्षण कोई भीख नहीं,हमारा अधिकार है,
समानता की नींव पर टिका यह संसार है,
जो ताक में बैठे हैं समता का गला घोंटने को,
जो आतुर हैं बाबासाहेब के सपनों को रौंदने को,
उन्हें बता दो कि अब युग बदल चुका है,
चेतना का शंखनाद चारों ओर बज चुका है,
अब चुप बैठना गुमराह होने जैसा होगा,
हक के लिए न लड़ना गुनाह होने जैसा होगा,
उठो और अपनी कलम को हथियार बनाओ,
संविधान की ताकत का सबको एहसास कराओ,
जो नफरत की दीवारें खड़ी करते हैं राहों में,
संवैधानिक मर्यादा से उनको घुटनों पर लाओ,
यह देश समता,बंधुत्व और न्याय से चलेगा,
कोई भी विरोधी अब इस आग को न रोक सकेगा।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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