आधुनिक ज्ञान
जात न पूछो साधु की पर उन्हें जात पूछने दो,
पेट पकड़के सोइए उन्हें छप्पन भोग ठूंसने दो,
ये सच है कह गये ज्ञानी क्या है तेरा क्या है मेरा,
है यहां सब कुछ जाति भी तेरा जाति भी मेरा,
कुर्सी की इस दौड़ में कबीर का दोहा भूल गये,
ज्ञान गया अब भाड़ में,सब जाति की म्यान पे झूल गये,
डिग्री-विग्री छोड़िये,पहले अपना गोत्र बताइये,
वरना इस लोकतंत्र में चुपचाप बैठ के कसमसाइए,
वोट बैंक का खेल है,ये अद्भुत चश्मा भाई,
ज्ञान-वान सब गौण है,बस अपनी बिरादरी काम आई,
जो सच कहे वो मूरख है,जो जात गिने वो सयाना है,
आधुनिक इस दौर का बस यही एक तराना है,
योग्यता रोती कोने में,और पर्चा यहां बिक जाता है,
नेताजी की रैली में जो जितनी जातियाँ लाता है,
अस्पताल के बेड पर भी अब रिश्तेदारी ढूंढ रहे,
इलाज से पहले लोग यहां अपनी बिरादरी पूछ रहे,
अमृतकाल के दौर में यह कैसा नया सवेरा है,
इंसानियत तो लापता है,बस तेरा-मेरा घेरा है,
साधु-संत भी बदल गये,अब माला नहीं वो सीट गिनें,
तुम भूखे भजन करो प्यारे,वो वोट बैंक की फसल लुनें।
— राजेन्द्र लाहिरी
