कहानी

मेहनतकश

आज फिर खेत में काम करते हुए सूर्य का प्रकाश मध्यम पड़ने लगा था लेकिन विवेक की हिम्मत अभी तक मध्यम नहीं पड़ी थी। वह अब भी उसी उत्साह से अपने खेत में जुटा हुआ था। अंधेरा होने से पहले ही खेत में की गई उसकी आज की मेहनत रंग लाई। सब्जी के खेतों में उग आये सारे खरपतवार हटाकर उसने गोबर की खाद खेत मे डाल दी थी।
अपने खेत के मेड़ पर खड़ा होकर खेत में बोई गई सब्जियों पर सरसरी निगाह डाली फिर इतराता हुआ मुस्कराने लगा। उसने महसूस किया कि उसके साथ-साथ गोभी, बैंगन, पालक, मिर्ची, चुकंदर, मूली भी मुस्करा रहे हैं। अपने हर एक खेत में जा-जाकर सभी सब्जियों का उसने निरीक्षण-परीक्षण किया। उनके पास खड़े हो-होकर एक बार फिर से उनको प्यार से सहलाते हुए कुछ बुदबुदाया। फिर मेड़ पर थोड़ी देर खड़ा होकर उन्हें निहारता रहा। आसमान की ओर देखा, डूबते हुए सूर्य को प्रणाम किया। बोयी गयी अपनी सब्जियों की ओर मातृत्व भरी दृष्टि डालकर एक बार फिर से मन ही मन में बोला। जैसे कह रहा हो- ‘आराम करो अब तुम सभी, सुबह फिर मिलूँगा।‘ पास ही खड़े नीम के पेड़ पर रखा अपना दुशाला उठाया और खुद को उससे लपेटता हुआ घर की ओर चल पड़ा।
परिवार के कड़े विरोध के बावजूद उसने चार वर्ष पहले इन खेतों में काम करना शुरू किया था। जब उसने पहली बार धान, गेहूँ और सरसों जैसी पारंपरिक फसलों के स्थान पर सब्जियाँ उगाने की इच्छा जताई, तो घर में मानो भूचाल आ गया। एक तो नौकरी छोड़कर खेती अपनाने का निर्णय, तिस पर दूसरे किसानों की तरह अन्न उगाने के बजाय सब्जियों की खेती—उसका यह कदम परिवार में किसी को भी रास नहीं आया था।
पिता ने तो घुड़कते हुए कहा था कि एम०बीए० की डिग्री दिलवाई तुझे, क्या इन सब के लिए। लेकिन विवेक के सिर पर तो जुनून सवार था। घर वालों से बगावत कर वह अपनी लगी-लगायी बढ़िया नौकरी को ठुकरा कर अपने पुश्तैनी गाँव में आ गया था।
जब वह गाँव में आया था उस समय पूरा गाँव वीरान था। खेती-बाड़ी जिनकी थी उन्होंने अपने खेत परती छोड़ रखे थे या फिर उनमें से कईयों ने अपने खेतों को अधिया पर दे, शहर में नौकरी करते थे| उसके पिता की अब बारह बीघे जमीन ही बची थी। बाकी जमीन उसके और उसके बहन की पढ़ाई के लिए बिक चुकी थी।
महीने भर गाँव में रहकर पहले-पहल उसने वहाँ के वातावरण को परखा फिर अपने खेत की मिट्टी की जाँच-पड़ताल करवाई। यह सब करने के पश्चात उसने निर्णय लिया कि वह पारंपरिक खेती नहीं करेगा बल्कि मौसमी सब्जियाँ उगाएगा और उन्हें ऑनलाइन मार्केट में बेचेगा। उसके इस कार्य में उसकी एम० बीए० की डिग्री ने भरपूर मदद की।
अपने दादा-परदादा के बचे-खुचे खेतों की देखभाल करने की योजना उसके दिमाग में यूँ ही अचानक नहीं आयी थी| यह निर्णय धीरे-धीरे परिस्थितियों ने उसके भीतर अंकुरित किया था। उसने अपने दोस्तों को देखा था नौकरी से फायर होते हुए| जब कॉलेज की तरफ से उसे भी नौकरी के लिए कंपनी ने चुना था तो वह बहुत खुश हुआ था। लेकिन एक-एक करके अपने सीनियर दोस्तों को नौकरी से निकाले जाने की खबर सुनता था तो उसका दिमाग थोड़ी देर के लिए शून्य-सा पड़ जाता था। उसे अपना भविष्य भी अंधकारमय लगने लगता था।
अपनी माँ से खेतों का जिक्र सुनता रहता था।उनसे ही यह भी सुनने में आता था कि अधिया पर खेतों को जिसे दिया है वह कितनी बेईमानी करता है। पैदावार का आधा क्या तिहावा भी नहीं देता है, और लागत का आधा हिस्सा पिता से वसूल करता है। कभी नीलगाय, कभी मौसम की मार का कहकर उपज कम बताता है। इधर नौकरी की अनिश्चितता, उधर अपने खेतों में होती धोखाधड़ी को सुनकर खेतों में खुद ही मेहनत करने का विचार अंकुर रूप में उसके दिमाग में पनपने लगा था। आखिर दूसरे के लिए आठ घंटे मेहनत करने से अच्छा है अपने ही खेत में क्यों न मेहनत की जाय। बस मन में ऐसा विचार आते ही, वह चल पड़ा था इस राह पर।
धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई थी। बिग-बॉस्केट जैसी सब्जी सप्लाई करने वाली कंपनियों से उसका टाई-अप हो गया था। जो गाँव वाले उसके बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे होने के बावजूद खेती करने पर हँसते थे, आज वो सभी उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे।
विवेक के बारे में अखबारों में खबर पढ़कर उसके गाँव के कई लड़के अपनी प्राइवेट नौकरियाँ छोड़कर अपने पुरखों के खेत पर काम करने लगे थे। कोई सब्जी उगाने लगा था, कोई फूलों की खेती करने लगा, कोई आयुर्वेदिक औषधियों के पौधे लगाकर आमदनी करने लगा था। सभी मिलकर खेती की नई-नई तरकीबें सोचते और उन्हें खेतों में अमल में लाते। मेहनत भी कर रहे थे और खुद की मर्जी के मालिक भी थे। उन्हें अब किसी के दबाव में आठ घंटे की ड्यूटी नहीं करनी पड़ रही थी बल्कि उनकी खुद के अंडर में कई कर्मचारी लगे हुए थे।
विवेक के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से अब उसके गाँव ही नहीं बल्कि आसपास के गाँव के लड़के भी दूरदराज की दस-बीस हजार की अपनी नौकरी छोड़कर अपने-अपने खेतों में आकर मेहनत करने लगे थे। अखबार में विवेक के उपलब्धियों की खबरें अक्सर छपती रहती थी। आई० आई० टी० से एम.बीए. की पढ़ाई करके लड़का १२ लाख का पैकेज छोड़कर सब्जियों के अपने धंधे को कैसे चमकाया| कैसे गाँव की वीरान पड़ी जिंदगी में रौनक लाया; कैसे अब उसके गाँव की सड़कों पर गाड़ियाँ फर्राटे भरती हैं । ये सारी खबरें अखबारों के जरिये सबके पास पहुँच रही थीं। उड़ती-उड़ती ये खबरें कलेक्टर साहब के पास भी पहुँची थीं।
कुछ समय बाद गाँव में सुनगुन सुनाई पड़ने लगी थी कि विवेक को उसकी मेहनत, लगन और दूसरों को खेती की ओर आकर्षित करने के लिए 26 जनवरी को सम्मानित किया जाएगा। यह खबर सुनकर विवेक के माता-पिता, उसके गाँव वाले, सभी लोग गर्वान्वित हो रहे थे।
इन सब बातों से बेखबर विवेक खेत में खड़े होकर अपने द्वारा लगाई सब्जियों को सहलाता हुआ, उनसे बतिया रहा था कि विवेक के दोस्त ने आवाज लगाते हुए कहा- “सुन रहे हो भाई, अरे भई, अपनी सब्जियों में ही मगन रहोगे या देश दुनिया की ओर भी ध्यान दोगे!”
“क्या हुआ, इतना काहे बेहबल (क्यों खुश) हुए जा रहे हो।”
“अरे यार, क्यों न होऊँ। अरे भई, तुम्हें छब्बीस जनवरी पर अवार्ड देने की खबर जो हाथ लगी है।”
यह सुनकर विवेक मुस्कराता हुआ आकाश की ओर निहारने लगा। खेत में लगीं सब्जियों को एक बार फिर से पास जाकर उसने हौले से सहलाया। सूर्य प्रखर रूप से चमक रहा था। बादल छंट चुके थे। बादल भी आखिर कब तक सूर्य की चमक को ढकते। सूर्य की उजास अब मुस्कराते हुए विवेक के चेहरे पर उतर आई थी। और उसके चेहरे पर खिलती मीठी मुस्कराहट लहलहाती सब्जियों पर बिखर रहा था।

— सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

*सविता मिश्रा

श्रीमती हीरा देवी और पिता श्री शेषमणि तिवारी की चार बेटो में अकेली बिटिया हैं हम | पिता की पुलिस की नौकरी के कारन बंजारों की तरह भटकना पड़ा | अंत में इलाहाबाद में स्थायी निवास बना | अब वर्तमान में आगरा में अपना पड़ाव हैं क्योकि पति देवेन्द्र नाथ मिश्र भी उसी विभाग से सम्बध्द हैं | हम साधारण गृहणी हैं जो मन में भाव घुमड़ते है उन्हें कलम बद्द्ध कर लेते है| क्योकि वह विचार जब तक बोले, लिखे ना दिमाग में उथलपुथल मचाते रहते हैं | बस कह लीजिये लिखना हमारा शौक है| जहाँ तक याद है कक्षा ६-७ से लिखना आरम्भ हुआ ...पर शादी के बाद पति के कहने पर सारे ढूढ कर एक डायरी में लिखे | बीच में दस साल लगभग लिखना छोड़ भी दिए थे क्योकि बच्चे और पति में ही समय खो सा गया था | पहली कविता पति जहाँ नौकरी करते थे वहीं की पत्रिका में छपी| छपने पर लगा सच में कलम चलती है तो थोड़ा और लिखने के प्रति सचेत हो गये थे| दूबारा लेखनी पकड़ने में सबसे बड़ा योगदान फेसबुक का हैं| फिर यहाँ कई पत्रिका -बेब पत्रिका अंजुम, करुणावती, युवा सुघोष, इण्डिया हेल्पलाइन, मनमीत, रचनाकार और अवधि समाचार में छपा....|

Leave a Reply