ग़ज़ल
न हम साया न कोई घर रहा है,
शजर से एक पत्ता गिर रहा है।
वो दुनया के लिए बेहतर रहा है,
जो मालिक ख़ुद कभी नौकर रहा है।
खंडर वो भी बहुत सुंदर रहा है,
जो बारिश में किसी का घर रहा है।
वो जिस धरती को सजदा कर रहा है,
कभी इस पर कोई मंदिर रहा है।
वो अब भी फ़िक्र उसकी कर रहा है,
किसी बस्ती में उसका घर रहा है।
मैं उसमें था मगर दिखता नहीं था,
कि इक लश्कर फ़क़त लश्कर रहा है।
जिसे है प्यार अपनी बेवा मां से,
वो बचपन से ही मेहनत कर रहा है।
फ़क़त सादा थी जिस लड़के की सूरत,
वही मां के लिए सुंदर रहा है।
उसी मजमे के अंदर मैं खड़ी हूं,
वो जिस जानिब इशारा कर रहा है।
नहीं पहचाना तू अब तक भी उसको,
कि जो नुक़सान तेरा कर रहा है।
किसी के प्यार का उत्तर न देकर,
कि तू ये जुर्म भारी कर रहा है।
फ़क़त तन्हा नहीं मरता है कोई,
किसी के साथ भी कुछ मर रहा है।
कई दिन तक नहीं निकला है घर से,
जो कुछ दिन के लिए बाहर रहा है।
ठहरता है गले पर हाथ अब भी,
बहुत दिन तक यहां ज़ेवर रहा है।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
