तीसरा – पुत्र
एक दिन –
सेवा – निवृत्त
अपने मित्र से
मैं यूँ ही –
पूछ बैठा
आप का क्या हाल – चाल है?
सरकारी सेवा में उच्च पद पर –
कार्यरत आज – कल –
आपके दोनों लाल कहाँ हैं?
एक लम्बी सांस लेकर
वे बोले –
अपनी व्यथा – कथा को कैसे –
बतलाऊं?
मित्र, अपना दुख – दर्द किसे –
सुनाऊँ?
मेरे जीवन भर की कमाई गठरी
आपस में बांट – बूट कर
दोनों नालायक-
मुझसे ही अलग हो गये हैं!
जीवन की ठठरी लिए – लिए –
हम कहीं के न हुए
माया के भंवरजाल में खो गए हैं
न जाने –
कहाँ गए वे दिन?
आज हम –
दुख – दर्द- पीड़ा के पर्याय –
हो गये हैं!
हाँ –
हर पहली तारीख को –
तीसरा धर्म – पुत्र
एक दिन के लिए-
सरवन की तरह
मेरे जीवन में आता है!
रिक्त पड़े –
पाॅकेट मे कुछ पैसे
डाल जाता है!!
वही-
दो रोटी का –
बन्दोबस्त कर जाता है!!!
आज – कल –
उसी के सहारे जी रहा हूँ!
नालायक पुत्रों की याद में –
आसूं पी रहा हूँ!!
रिश्ते- नातों के इस-
स्वार्थी दुनिया में
मैं-
निपट अकेला
जीवन – पर –
चल रहा हूँ!!
व्यर्थ में –
सब कुछ-
पुत्रों के नाम कर –
खाली हाथ मल रहा हूँ!!!
मित्र की बात सुन –
मैं चौंका
और –
पूछ बैठा –
ओ मित्र!
सरकारी सेवा में कार्यरत-
आप के तो दो ही
पुत्र रहे हैं
यह तीसरा पुत्र कौन है?
जो आज के युग में भी –
अपने फर्ज के प्रति
इतना वफ़ादार है!
दिल में इतना ढेर सा प्यार है!!
एक लम्बी सी आह भरते हुए –
मित्र ने कहा –
अरे भाई!
यह कोई और नही चौथेपन का-
मेरा धर्म-पुत्र पेन्शन है!
जो मेरे विरान जिन्दगी में –
हर महीने में एक दिन के लिए
आता है!
रोटी-धोती के मुहताज –
मुझ जैसे –
असंख्य लोगों को जिलाता है!!
संबन्धों के इस भूल – भूलैया मे-
तमाम लोगों का-
यही तो –
एक मात्र असली धर्म – पुत्र है!
हताशा में –
आशा का एक सूत्र है!!
आज के इस युग में –
मुझ जैसे –
तमाम असहाय लोगों का –
सहारा है!
यह तीसरा धर्म – पुत्र पेन्शन –
कितना प्यारा है!
कितना प्यारा है!!
— सूर्यनारायण गुप्त “सूर्य “
