मेरा दंभ : चित्र एक
सोचा था
जिंदगी की तमाम –
बातों को सहेज़ कर
जिंदगी के नाम-
एक पाती लिखूँ!
इतिहास के पृष्ठों पर-
न सही
पर-
हासिये पर तो दिखूँ!!
पर अफ़सोस-
कलम पंगु हो गई
महत्वाकांक्षा के सतरंगी-
सपनें
सब के सब बेरंगी हो गई
शब्द-
जिन पर
मैंने भरोसा किया-
दम तोड़ गए!
मुझे-
कोरे कागज के साथ अकेला
बिल्कुल अकेला छोड़ गए!!
— सूर्यनारायण गुप्त ” सूर्य “
