बेटे के नाम पाती
बेटे।
मैंने-
अपने जीवन ज्योति से
तेरे जीवन-पथ को सजाया
उस पर-
प्रकाश ही प्रकाश फैलाया
तेरे अंधेरे को-
सदैव गले लगाया
जलते-जलते
जब-
मेरा जीवन दीप
ज्योतिहीन हो गया
मेरा उजाला
तेरे उजालें में खो गया
तू जवान, मै बूढ़ा हो गया
ऐसे में-
यह कैसा दिन आया?
प्यार के बदले
तुझसे उपेक्षा ही उपेक्षा पाया-हर ओर अंधेरा ही अंधेरा छाया
मैने तुझे-
सदैव चूमा/चाटा/दुलारा
तुने मुझे-
किश्तों में मारा
मेरे मन में तेरे लिये सदैव-स्वस्थ, दीर्घायु की कामना
तेरे मन में मेरे लिये-शीघ्र मौत की चाहना
अमावश के इस पहर में खंडित रिश्तों के शहर में
खून के रिश्ते को
तुने इतनी सहजता से भुलाया बेटे !
जीवन के इस लीला को मै-समझ नही पाया
तूने-मेरे इस टिमटिमाते जीवन दीप को टूटे-फूटे कोने में फेक गये
अपने आस्था के बदबूदार सूप में रखकर कटु-वाणी से मार-मार कर
दीपावली की रात्रि के अन्तिम पहर में-दरिद्र खेदने की रस्म की तरह मुझे भी दरिद्र समझ-
व्यवहारतन-
मन/वचन/कर्म से प्रताड़ित कर-कर खेद-खेद कर घर से भगाया
जीवन के इस अन्तिम पहर में बेटे !
तूने यह कैसा खेल रचाया?
क्या तुझे तनिक लोक-लाज भी नही आया?
— सूर्य नारायण गुप्त ‘सूर्य’
