मेरे शहर के श्रृंगार पर भारी है ड्राई-डे
दो अक्टूबर। यानी राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी का जन्मोत्सव। सरकारी कैलेंडर में इसे गांधी जयंती कहते हैं, और मेरे शहर रीवा लालगांव के कैलेंडर में इसे ‘सूखा दिवस’ कहते हैं। सरकार कहती है आज अहिंसा दिवस है। शराब की दुकानें बंद रहेंगी। बापू की आत्मा को शांति मिलेगी।
पर मेरे शहर के जो प्रबुद्ध पियक्कड़ हैं, वो बापू से भी ज्यादा दूरदर्शी हैं। वे जानते हैं कि सरकार बापू को एक दिन याद करेगी, इसलिए वे बापू से एक दिन पहले ही बापू जयंती का इंतजाम कर लेते हैं। एक अक्टूबर की शाम को ठेके पर ऐसी भीड़ लगती है, जैसे अयोध्या में राम मंदिर का प्रसाद बंट रहा हो। हर हाथ में थैला है, थैले में भविष्य सुरक्षित है। एक-एक बोतल को ऐसे सहेज कर ले जाते हैं जैसे कोई नवजात शिशु को ले जा रहा हो। जो व्यक्ति साल के 364 दिन शराब पीकर चौराहे पर पड़ा रहता है, और जिसे देखकर हम नाक-भौं सिकोड़ते हैं, यकीन मानिए उसी से शहर की रौनक है और श्रृंगार है।
ड्राई डे वाले दिन शहर देखिए। चौराहे सूने हैं। गालियां देने की आवाजें नहीं आ रहीं। नाली में कोई पड़ा नहीं है। ठेके के सामने ताश खेलने वाली मंडली गायब है। ऑटो वाला बिना लड़े सवारी बिठा रहा है। और तब जाकर अहसास होता है कि अरे, ये शहर तो कितना वीरान है। जैसे किसी विवाहिता की मांग से सिंदूर पोंछ दिया गया हो। जैसे दूल्हे की बारात से बैंड-बाजा गायब हो गया हो। जैसे शादी में डीजे बंद हो गया हो। शहर है, पर शहर में वो बात नहीं है। बापू ने कहा था – शराब अभिशाप है। शहर ने इस अभिशाप को ही अपना श्रृंगार बना लिया है।
बापू सोचते थे कि चरखे से स्वराज आएगा। शहर ने चरखे को म्यूजियम में रख दिया है और क्वार्टर की बोतल को अपनी अर्थव्यवस्था का चरखा बना लिया है और सबसे बड़ी विडंबना देखिए, जो आदमी साल भर शराब पीता है, वो दो अक्टूबर को सबसे बड़ा गांधीवादी बन जाता है। वो घर में बैठकर, दरवाजा बंद करके, लाइट धीमी करके, गांधी जी की फोटो की तरफ देखकर कहता है – “बापू, आज आपका दिन है, आज हम आपको बिल्कुल निराश नहीं करेंगे। हम घर में ही पियेंगे, बाहर निकलकर आपके ड्राई डे को गीला नहीं करेंगे।”
धन्य है मेरा शहर रीवा लालगांव जहाँ गांधी जयंती पर बापू के तीन बंदर तो नहीं दिखते, पर तीन बोतल वाले जरूर दिखते हैं – एक कहता है मैं आया तुम भी आओ, दूसरा कहता पियो और पिलाओ, तीसरा कहता है पीकर सब भूल जाओ।
हे शराबियों
तुमसे मेरा शहर है तुमसे ही मेरे शहर का श्रृंगार है
तुम हो तभी मेरे शहर की रातें और दिन गुलजार है।
— आशीष तिवारी निर्मल
