विकास की दौड़ में जीवन की बुनियाद क्यों दरक रही है?
विकास का उद्देश्य आर्थिक आँकड़े चमकाना है या नागरिकों का जीवन सँवारना? जब गाँव का किसान फसल के लिए पानी और शहर का नागरिक स्वच्छ हवा को तरसे, तो विकास की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है। देश को आधुनिक उद्योग, बेहतर सड़कें, ऊर्जा और मजबूत बुनियादी ढाँचे चाहिए, लेकिन इनकी कीमत आम आदमी के स्वास्थ्य, आजीविका और प्राकृतिक संसाधनों से नहीं चुकाई जा सकती। सच्चा विकास वही है, जिसमें कुएँ सूखें नहीं, खेतों तक पानी पहुँचे, शहरों की हवा साँस लेने योग्य हो और हर नागरिक को बुनियादी सुविधाएँ सम्मानपूर्वक मिलें। इसकी कसौटी ऊँची इमारतें, निवेश और चमकदार आँकड़े नहीं, बल्कि आम आदमी का सुरक्षित व स्वस्थ जीवन है। जब तक पानी और हवा जैसी जरूरतें सबकी पहुँच में नहीं होंगी, विकास के दावे अधूरे रहेंगे।
गाँवों का जल संकट मानसून की अनिश्चितता के साथ भूजल के अंधाधुंध दोहन, पारंपरिक जलस्रोतों की उपेक्षा और कुप्रबंधन का नतीजा है। गिरते भूजल स्तर से नलकूपों से पानी निकालना कठिन और महँगा हो रहा है। नहरें खेतों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुँचा रहीं और तालाब अतिक्रमण की भेंट चढ़ रहे हैं। लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचाई संकट से जूझ रही है। शहरों और उद्योगों की बढ़ती जरूरतें जल संसाधनों पर दबाव डाल रही हैं। बाँध और बड़ी परियोजनाएँ बनती हैं, पर जलस्रोतों के रखरखाव और न्यायपूर्ण वितरण की अनदेखी है। नतीजतन, फसलें सूखती हैं, किसानों पर कर्ज बढ़ता है और ग्रामीण पलायन को मजबूर हैं। अन्नदाता के खेत में ही पानी अनिश्चित है। यह मौसम की मार ही नहीं, जल प्रबंधन की विफलता भी है।
शहरों में विकास की कीमत स्वच्छ हवा चुका रही है। ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों, बढ़ते वाहनों और औद्योगिक विस्तार के बीच साँस लेना दूभर है। दिल्ली-एनसीआर में पीएम 2.5 का स्तर सितंबर 2026 में औसतन लगभग 39 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा, जबकि अक्टूबर में यह तेजी से बढ़ने लगता है (पिछले वर्षों में अक्टूबर का औसत अक्सर 100 से ऊपर रहा है)। अनेक शहरों की वायु गुणवत्ता खराब या बहुत खराब श्रेणी में है। वाहनों का धुआँ, निर्माण की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और कचरा जलाना प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। इसकी मार बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों पर पड़ रही है। प्रदूषणजनित बीमारियाँ और असमय मौतें गंभीर स्वास्थ्य चुनौती हैं। बच्चे मास्क लगाकर स्कूल जा रहे हैं, बुजुर्ग साँस की समस्याओं से जूझ रहे हैं। स्वच्छ हवा अब आर्थिक क्षमता पर निर्भर है। संपन्न लोग एयर प्यूरीफायर खरीद सकते हैं, जबकि गरीब प्रदूषण से बचने के प्रभावी विकल्पों से वंचित हैं।
विकास का विरोधाभास आर्थिक उपलब्धियों और आम आदमी की हकीकत में साफ झलकता है। सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है, सड़कें-पुल बन रहे हैं, निवेश और औद्योगिक परियोजनाएँ फैल रही हैं। लेकिन भूजल घट रहा है, जलस्रोत सूख रहे हैं और हवा दूषित हो रही है। बिजली की बढ़ती माँग और कटौती ग्रामीण-शहरी जीवन को प्रभावित कर रही है। बड़े प्रोजेक्टों पर भारी खर्च होता है, पर जल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और सार्वजनिक सुविधाओं के रखरखाव को समान प्राथमिकता नहीं मिलती। विकास केवल निर्माण और निवेश नहीं है। आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ें, लेकिन पीने का पानी और स्वच्छ पर्यावरण न मिले, तो उसकी सामाजिक कीमत भी आँकनी होगी। चौड़ी सड़कें और चमकदार इमारतें तभी जनकल्याणकारी हैं, जब वे जीवन सुरक्षित और सुविधाजनक बनाएँ।
विकास के आँकड़ों में सड़कें, पुल, निवेश और उत्पादन दर्ज होते हैं, लेकिन पानी के लिए जूझते परिवारों और प्रदूषित हवा में साँस लेते बच्चों की पीड़ा ओझल रहती है। आर्थिक वृद्धि के साथ लाभों का वितरण और पर्यावरणीय कीमत भी अहम हैं। संसाधनों का लाभ कुछ क्षेत्रों को मिले और बोझ कमजोर वर्गों पर पड़े, तो विकास असंतुलित है। बाजार बोतलबंद पानी, निजी टैंकर और एयर प्यूरीफायर उपलब्ध कराता है, लेकिन इनकी पहुँच आर्थिक क्षमता पर निर्भर है। संपन्न लोग निजी उपायों से संकट टाल लेते हैं, जबकि गरीब सार्वजनिक व्यवस्था की विफलताओं का बोझ उठाते हैं। इसलिए विकास का आकलन केवल आर्थिक वृद्धि से नहीं, बल्कि सभी वर्गों तक उसके लाभ पहुँचने से भी होना चाहिए।
पानी और हवा के संकट परस्पर जुड़े हैं। जंगलों की कटाई, जलस्रोतों पर अतिक्रमण, अनियोजित शहरीकरण और भूजल का अंधाधुंध दोहन प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से अनियमित वर्षा, लंबे सूखे और अतिवृष्टि जल प्रबंधन को जटिल बना रहे हैं। कम बारिश से जलाशय घटते हैं, जिससे सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन प्रभावित होते हैं। हरित क्षेत्रों का सिकुड़ना और प्रदूषणकारी गतिविधियाँ शहरी पर्यावरण पर दबाव बढ़ाती हैं। संकट में टैंकर भेजना या अस्थायी प्रतिबंध समाधान नहीं। वर्षा जल संचयन, तालाबों का पुनर्जीवन, भूजल पुनर्भरण, सूक्ष्म सिंचाई, हरित क्षेत्रों का संरक्षण और औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण विकास योजनाओं का अनिवार्य हिस्सा हों। पर्यावरण संरक्षण विकास की बुनियादी शर्त है, औपचारिकता नहीं।
विकास के नाम पर यदि खेत प्यासे, नदियाँ सूखी और शहर जहरीली हवा की गिरफ्त में हों, तो चमकते आँकड़े भी बदहाली की हकीकत नहीं छिपा सकते। उद्योग, निवेश और बुनियादी ढाँचे जरूरी हैं, लेकिन इनकी कीमत किसानों की आजीविका, नागरिकों के स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों के विनाश से नहीं चुकाई जा सकती। प्रगति की दिशा ऐसी हो, जिसमें सिंचाई, वर्षा जल संचयन, स्वच्छ ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन और प्रदूषण नियंत्रण को प्राथमिकता मिले। इसके लिए सरकार, उद्योग और समाज की जवाबदेही तय करने के साथ संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और पर्यावरणीय प्रभावों का पारदर्शी आकलन सुनिश्चित करना होगा। आखिर जिस व्यवस्था में अन्नदाता सिंचाई के लिए तरसे, नागरिक शुद्ध वायु को संघर्ष करें और बुनियादी सुविधाएँ ही विलासिता बन जाएँ, उसकी उपलब्धियों का ढोल पीटने का क्या औचित्य? सार्थक प्रगति की कसौटी ऊँची इमारतें और पूँजी निवेश नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वच्छ पर्यावरण, पर्याप्त पेयजल, सुरक्षित आजीविका और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना है।
— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
