श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव
श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव (S.N.L.F.) के पंचम वार्षिक उत्सव के अवसर पर एक बार फिर भुवनेश्वर की धरती साहित्य, संस्कृति और सृजन की विविध आवाज़ों से गुंजायमान हो उठी। 26 एवं 27 सितंबर को जयदेव भवन, भुवनेश्वर में आयोजित दो दिवसीय साहित्यिक महोत्सव में देश के विभिन्न राज्यों से आए कवि, कथाकार, अनुवादक, आलोचक और साहित्यकार एक मंच पर एकत्र हुए। महोत्सव ने भारतीय भाषाओं की विविधता में निहित सांस्कृतिक एकता और साहित्य की मानवीय संवेदना का जीवंत स्वरूप प्रस्तुत किया।

महोत्सव के अवसर पर साहित्यिक पत्रिका ‘शब्दब्रह्म’ के विशेष महोत्सव अंक तथा रंगीन पत्रिका ‘बतायन’ का भव्य विमोचन किया गया। विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों की उपस्थिति और उनकी रचनात्मक अभिव्यक्तियों ने पूरे आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।
साहित्य हमें केवल शब्द नहीं देता, बल्कि दूसरे मनुष्य के अनुभवों तक पहुँचने का मार्ग भी प्रदान करता है। अलग-अलग भाषाओं में लिखे गए शब्द भले ही अलग सुनाई दें, किंतु उनकी संवेदना, करुणा, प्रेम, संघर्ष और सपने अक्सर एक ही मानवीय धरातल पर आकर मिलते हैं। यही साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति है—वह भाषा की सीमाओं को पार कर मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव इसी भावना का उत्सव बनकर सामने आया।
महोत्सव में पद्मश्री देवी प्रसन्न पटनायक, प्रख्यात द्विभाषी कवि अश्विनी कुमार, प्रसिद्ध द्विभाषी कवि प्रो. सुबोध सरकार, सुप्रसिद्ध हिंदी कवि नरेंद्र पुण्डरीक, प्रख्यात ओड़िया आलोचक प्रो. प्रफुल्ल कुमार महांती, तेलुगु साहित्यकार प्रसन्न कुमार, विश्व हिंदी परिषद, ओडिशा प्रदेश के अध्यक्ष एवं हिंदी कवि-साहित्यकार विक्रमादित्य सिंह, चित्तरंजन भोई, रचना, संजय बोरुडे सहित अनेक विशिष्ट साहित्यकार उपस्थित रहे।
केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक प्रदीप बिहारी, डॉ. हृषीकेश मल्लिक, अमृता बेरा सहित सौ से अधिक कवि एवं लेखकों ने महोत्सव में सहभागिता की। असमिया, बांग्ला, हिंदी, ओड़िया, संस्कृत, उर्दू, मराठी, अंग्रेज़ी, तेलुगु, तमिल, संबलपुरी और मैथिली सहित अनेक भाषाओं के साहित्यकारों की सहभागिता ने इस आयोजन को भारतीय साहित्य की व्यापकता, बहुलता और सांस्कृतिक एकात्मता का जीवंत उदाहरण बना दिया।

महोत्सव में पुस्तक लोकार्पण, पैनल डिस्कशन तथा विभिन्न भारतीय भाषाओं के कवियों की बहुभाषी काव्य-पाठ प्रस्तुति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। अलग-अलग भाषाओं के साहित्यकारों को एक मंच पर सुनना भारतीय साहित्य की समृद्ध परंपरा और उसकी जीवंत बहुलता का अनुभव करने जैसा था।
‘संवेदना और आत्मा’ विषय के अंतर्गत दो महत्वपूर्ण परिचर्चा सत्र आयोजित किए गए—‘अनुवादक बनाम ए.आई.’ तथा ‘क्या कथा-लेखन सौंदर्य के लिए है या दायित्व के लिए?’
‘क्या कथा-लेखन सौंदर्य के लिए है या दायित्व के लिए?’ विषयक परिचर्चा की अध्यक्षता प्रसिद्ध मैथिली उपन्यासकार प्रदीप बिहारी ने की। परिचर्चा में प्रख्यात ओड़िया कथाकार प्रकाश महापात्र, प्रो. सुधीर जोशी, संजय बोरूदे , उदय थुलुंग ,असमिया कवि राजीव फूकन सहित अनेक साहित्यकारों ने भाग लेकर कथा-साहित्य के सौंदर्यबोध, सामाजिक सरोकार और रचनाकार के दायित्व पर अपने विचार व्यक्त किए।
वहीं ‘अनुवादक बनाम ए.आई.’ विषयक महत्वपूर्ण विमर्श में अनेक विद्वानों और पुरस्कारप्राप्त अनुवादकों ने सक्रिय भागीदारी की। श्यामली सेनगुप्ता, सुतपा साहा, अनिमा दास, राजीव फूकन, दिनेश माली, बरनाली शर्मा, पारमिता षड़ंगी, मराठी कवि संजीव बोरुडे, रचना सहित अनेक साहित्यकारों ने अनुवाद की बदलती भूमिका, भाषाई संवेदना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव पर विचार साझा किए।
महोत्सव के प्रथम दिन मंचासीन अतिथियों—प्रख्यात लेखक अश्विनी कुमार, प्रो. सुबोध सरकार, पद्मश्री देवी प्रसन्न पटनायक, डॉ. फनी महांती, श्री जामिनीकांत दास, श्री प्रणब छोटराय, सचिव, साहित्य संस्कृति समारोह तथा डॉ. सत्यव्रत जेना, सचिव, राष्ट्रीय साहित्यिक आयोजन समिति के कर कमलों से अनेकों पुस्तको का लोकार्पण किया गया।
दो दिनों तक चले इस महोत्सव में युवा और वरिष्ठ साहित्यकारों की उत्साहपूर्ण भागीदारी रही। विशेष रूप से महिला रचनाकारों की उल्लेखनीय उपस्थिति ने आयोजन को नई ऊर्जा प्रदान की। पुस्तक विमोचन, काव्य-पाठ और विचार-विमर्श के माध्यम से विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद की नई संभावनाएँ विकसित हुईं।
आयोजन की रूपरेखा के संबंध में डॉ. सत्यव्रत जेना, सचिव, श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव तथा प्रणब कुमार छोटराय, सचिव, साहित्य संस्कृति समारोह ने बताया कि भाषाई दूरियों को कम करने और विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को एक साझा मंच प्रदान करने के उद्देश्य से पिछले छह महीनों से कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की जा रही थी। विभिन्न राज्यों से आए शिक्षाविदों एवं साहित्यकारों ने आयोजन की सफलता के लिए संस्था को शुभकामनाएँ दीं।
कार्यक्रम को सुचारू एवं सफल बनाने में मंच संचालक पारमिता षड़ंगी, सोनाली साहू एवं संघमित्रा रायगुरु की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अंत में डॉ. सरोज महापात्र ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
ओडिशा केवल एक तीर्थभूमि नहीं, बल्कि सदियों से भारतीय सांस्कृतिक चेतना का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। ऐसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवेश में आयोजित श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव ने साहित्य के माध्यम से संवाद, विचार और सृजन की नई संभावनाओं को सामने रखा।
केंद्रीय साहित्य अकादमी एवं ओडिशा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ कवि डॉ. फनी महांती के मार्गदर्शन में आयोजित इस महोत्सव को सफल बनाने में साहित्य एवं संस्कृति समारोह के सचिव प्रणब कुमार छोटराय तथा राष्ट्रीय सारस्वत उत्सव के संपादक डॉ. सत्यव्रत जेना की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
— पारमिता षड़ंगी.
