द्रष्टा
आँखों से आँसु क्यों झराऊँथोडे दिन का इंतजार औरबारिश आ जाएँगा तोमैं तो कपड़ा सुखाने केतार के जैसे बंधी हुई
Read Moreउस दिन घडी थी पापा के हाथ मेंऔर वक्त था मेरे साथपता नहीं कहाँ…. कैसे गुम गएवो घड़ी… और…वो वक्तकहीं
Read Moreस्याही-सा फैला आसमानमैं रख लूँगा,मुझे आदत है अँधेरों की,तू सुबह रख ले।रात की चादर में सिलते हुएमैंने कई ख़ामोशियाँ ओढ़ी
Read Moreअभी आसमान के सीने परबादलों ने ख़त लिखा हैउसमें तेरा-मेरा नाम है लिखामगर स्याही थोड़ी घनी हो गईजो बरसात बनकर
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