स्याही-सा फैला आसमान
स्याही-सा फैला आसमानमैं रख लूँगा,मुझे आदत है अँधेरों की,तू सुबह रख ले।रात की चादर में सिलते हुएमैंने कई ख़ामोशियाँ ओढ़ी
Read Moreस्याही-सा फैला आसमानमैं रख लूँगा,मुझे आदत है अँधेरों की,तू सुबह रख ले।रात की चादर में सिलते हुएमैंने कई ख़ामोशियाँ ओढ़ी
Read Moreअभी आसमान के सीने परबादलों ने ख़त लिखा हैउसमें तेरा-मेरा नाम है लिखामगर स्याही थोड़ी घनी हो गईजो बरसात बनकर
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