कविता

पीड़ा

मैं हूँ
इस ब्रह्माण्ड के किसी अणु परमाणु में
मेरा वजूद है ।
तुम इसे मिटाने लगे
मैं अपने विश्वास में खोने लगी
जीवन भर अपने वजूद के लिए
सवालों से जूझती रही ,
प्यार करने वाले कब
इतने क्रूर हो गए
पता ही नहीं चला !
एक इंद्रजाल में क़ैद थी
वह सच था या जादुई
किसे पता ?
क्या पत्तों के गिरते वक़्त
वसंत को आना चाहिए?
फिर भी कल सुबह होगी और
लम्हों पर गिरेगे ओस के बिंदु ।
नसों के पैरों में रक्त की गति
भूखा पेट भूख से ही भरता है ।
घड़ी में जो समय दिखाई देता है
वह हर किसी के लिए एक जैसा नहीं होता ।
ठीक समय पर पत्ता गिरता है,
जब पाँवो के नीचे
सूखे पत्तों में छुपी पानी की एक नन्ही सी बूँद
छटपटाती है, तब
उस दर्द को समझकर
कविता लिखने बैठ जाती हूँ मैं ।
किसी शून्य पर सवार होकर ।

— पारमिता षड़ंगी

पारमिता षड़ंगी

ओड़िआ साहित्य जगत म एक सुपरिचित नाम । वह अपनी आँचलिकता में सशक्त स्त्री-कथाकार एवं कवयित्री ही नहीं, कुशल ओड़िआ भाषानुवादक भी हैं। नारी मनस्तत्व की विश्लेषण, सूक्ष्म अवबोध की अन्वेषण तथा एक बलिष्ठ कहानी के आधार उनकी कहानियों को अलग परिचय देते हैं। जीवनवादी कहानीकार होते हुए भी पारमिता की कविताएँ चेतना और मानसिकता को खूब प्रभावित करती हैं। हिन्दी और ओड़िआ भाषा में कहानी, कविता लेखन में उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। अब तक उनकी 7 कहानी-संग्रह 5 कविता-संग्रह और 11 अनुवाद-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। पारमिता की रचनाएँ वागर्थ, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा ,नूतन कहानियाँ, देशज, देशधारा, विश्वगाथा, कृति बहुमत, माटी ,कथाक्रम, कथारंग, अंतरंग, पाठ, युगवार्त , परिंदा, व्यंजना आदि अनेक सुप्रसिद्ध पत्रिका में प्रकाशित हुई होने के साथ साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों और विदेश में भी प्रकाशित हुई हैं। उनकी रचनाओं का बंगाली, राजस्थानी, मैथिली ,पंजाबी, गुजराती, मराठी, तमिल, ओड़िआ और इंग्लिश भाषा में अनुवाद किया गया है। पारमिता को उनके कहानी-संग्रह 'संबित के पास जब मैं नहीं थी' के लिए महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की तरफ से पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। मुम्बई मो -9867113113