पीड़ा
मैं हूँ
इस ब्रह्माण्ड के किसी अणु परमाणु में
मेरा वजूद है ।
तुम इसे मिटाने लगे
मैं अपने विश्वास में खोने लगी
जीवन भर अपने वजूद के लिए
सवालों से जूझती रही ,
प्यार करने वाले कब
इतने क्रूर हो गए
पता ही नहीं चला !
एक इंद्रजाल में क़ैद थी
वह सच था या जादुई
किसे पता ?
क्या पत्तों के गिरते वक़्त
वसंत को आना चाहिए?
फिर भी कल सुबह होगी और
लम्हों पर गिरेगे ओस के बिंदु ।
नसों के पैरों में रक्त की गति
भूखा पेट भूख से ही भरता है ।
घड़ी में जो समय दिखाई देता है
वह हर किसी के लिए एक जैसा नहीं होता ।
ठीक समय पर पत्ता गिरता है,
जब पाँवो के नीचे
सूखे पत्तों में छुपी पानी की एक नन्ही सी बूँद
छटपटाती है, तब
उस दर्द को समझकर
कविता लिखने बैठ जाती हूँ मैं ।
किसी शून्य पर सवार होकर ।
— पारमिता षड़ंगी
