अकेली
मैं ढूँढती रही तुम्हें
न जाने किन-किन गलियों में, वादियों में
पलकें मूँदकर देखना चाहती थी
तुम्हारे चेहरे को
पर एक शून्य का एहसास हुआ
तुम तो थे नहीं
न आसपास
न एहसास में
सचमुच मैं अकेली थी ।
मुझे रुकना नहीं था
चलना था
कुछ छलावों को
कुछ कोहरे को
कुछ अफ़सोस को हटाकर ।
एक बार नहीं, कई बार महसूस किया
मिट्टी की धड़कन को
चलते-चलते
कितनी बार कहा था उसे
मुझे ऐसी आँखें चाहिए
कुछ अलग सपनों के लिए
कुछ भाव
कुछ शब्द
कुछ अभिलाषा को लेकर
अपनाना था कुछ स्वीकृतियों को
मगर कोई नहीं है
दिल को छू लेने वाली गीत गाने के लिए
कोई नहीं है क्षितिज के उस पार
डूबते सूरज से रंगों को लेकर
तितलियों को सजाने के लिए
कोई नहीं है इन्द्रधनुष में छिपे रंगों के
दर्द को बयान करने के लिए
सच कहो तो
समय से भला कोई और
क्या बेहतरीन अभिनय कर सकता है !
हाय !
कैसा जादूगर है वह
ख़ुशियों में दर्द का लेप लगाकर
कहता है जा जीवन की ख़ुशबू
महसूस कर,
मुझे तो पीछा करना है तेरा
अंतरिक्ष से उस पार तक
रहने दो जंजाल और कंकाल को यहाँ
मैं आऊँगी अकेली
हाँ, कितनी अकेली हूँ मैं ।
— पारमिता षड़ंगी
